नशामुक्त भारत: स्कूल की शपथ से आगे कब बढ़ेगा अभियान?
opinion editorial

नशामुक्त भारत: स्कूल की शपथ से आगे कब बढ़ेगा अभियान?

Oct 3, 2026

स्कूल में शपथ, दीवार पर बोर्ड और बाहर शराब की दुकान—क्या इतने भर से बनेगा नशामुक्त भारत?

नशामुक्त भारत: स्कूल की शपथ से आगे कब बढ़ेगा अभियान?

स्कूल में शपथ, दीवार पर बोर्ड और बाहर शराब की दुकान—क्या इतने भर से बनेगा नशामुक्त भारत?

हर वर्ष स्कूलों में नशामुक्त भारत अभियान के तहत आदेश जारी होते हैं। विद्यार्थियों को नशे से दूर रहने की शपथ दिलाई जाती है, पोस्टर लगाए जाते हैं, रैलियां निकाली जाती हैं और सरकारी पोर्टलों पर गतिविधियों के आंकड़े दर्ज किए जाते हैं। स्कूल की दीवार के किसी कोने में एक बोर्ड भी टंग जाता है—“धूम्रपान निषिद्ध क्षेत्र”, “नशामुक्त क्षेत्र”।

लेकिन उसी स्कूल के गेट से कुछ दूरी पर नजर डालिए। कहीं अंग्रेजी शराब की दुकान है, कहीं देशी मदिरा की दुकान और कहीं बड़े-बड़े अक्षरों में बीयर के विज्ञापन। आसपास की दुकानों पर गुटखा और तंबाकू के पाउच मालाओं की तरह लटके दिखाई देते हैं।

तब एक सवाल स्वाभाविक रूप से सामने आता है—बच्चों को नशे से दूर रहने की शिक्षा देने वाला संदेश आखिर किस वातावरण में दिया जा रहा है?

आंकड़े बताते हैं कि समस्या केवल भाषणों से हल होने वाली नहीं

भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के GATS-2 सर्वेक्षण के अनुसार 2016-17 में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के 28.6 प्रतिशत भारतीय किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन कर रहे थे। इनमें धूम्रपान के साथ-साथ गुटखा, खैनी और अन्य धुआंरहित तंबाकू भी शामिल हैं। मंत्रालय के अनुसार 2009-10 के 34.6 प्रतिशत की तुलना में यह कमी जरूर थी, लेकिन आबादी के स्तर पर समस्या अभी भी बहुत बड़ी थी।

और चिंता की बात केवल वयस्कों तक सीमित नहीं है।

भारत के Global Youth Tobacco Survey-4 (2019) में 13-15 वर्ष के विद्यार्थियों में 8.5 प्रतिशत ने वर्तमान में किसी न किसी तंबाकू उत्पाद के सेवन की बात कही। इनमें 4.1 प्रतिशत विद्यार्थी धुआंरहित तंबाकू का सेवन करते थे। सर्वेक्षण में 18 प्रतिशत विद्यार्थियों ने बिक्री के स्थानों पर तंबाकू के विज्ञापन या प्रचार देखे थे।

यानी जिस उम्र में बच्चे स्कूल में स्वास्थ्य और नशामुक्ति की शपथ ले रहे हैं, उसी उम्र में एक हिस्सा तंबाकू के संपर्क में भी आ रहा है।

शराब का सवाल और भी बड़ा है

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा प्रकाशित राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार, 10-75 वर्ष की आबादी में लगभग 14.6 प्रतिशत लोग शराब का सेवन करते थे, जिसकी अनुमानित संख्या लगभग 16 करोड़ थी। सर्वेक्षण में यह भी अनुमान लगाया गया कि 5.7 करोड़ से अधिक लोग शराब के हानिकारक या निर्भरता वाले सेवन से प्रभावित थे और उन्हें सहायता की आवश्यकता थी।

यह आंकड़ा बताता है कि शराब को केवल व्यक्तिगत पसंद या मनोरंजन का विषय मानकर छोड़ देना समस्या की वास्तविक व्यापकता को नजरअंदाज करना होगा।

सरकार को राजस्व चाहिए, लेकिन समाज को इसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है

यह तर्क समझ में आता है कि शराब की बिक्री से राज्यों को आबकारी राजस्व मिलता है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के 2026-27 बजट में राज्य आबकारी से ₹71,278 करोड़ राजस्व का बजट अनुमान रखा गया था।

इसलिए सवाल यह नहीं है कि शराब की बिक्री से सरकार को राजस्व क्यों मिलता है। असली सवाल यह है कि उस राजस्व के साथ नशे से होने वाली सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी लागत को नीति में कितना महत्व दिया जाता है?

एक तरफ आबकारी विभाग के लिए शराब राजस्व का स्रोत है और दूसरी तरफ स्वास्थ्य विभाग को उससे पैदा होने वाली बीमारियों, दुर्घटनाओं और निर्भरता की समस्या से निपटना पड़ता है।

इसी विरोधाभास को सार्वजनिक नीति की भाषा में गंभीरता से देखने की जरूरत है।

स्कूल की शपथ बनाम बाजार की ताकत

स्कूल में एक शिक्षक 40-50 मिनट की कक्षा में विद्यार्थियों को समझाता है कि तंबाकू और शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं।

लेकिन दूसरी तरफ बच्चा लगातार बाजार, मनोरंजन और डिजिटल माध्यमों से अलग-अलग संदेश देखता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार शराब की मार्केटिंग अब केवल पारंपरिक विज्ञापनों तक सीमित नहीं है। खेल, सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रायोजन, सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और फिल्म-टीवी में उत्पादों की उपस्थिति जैसे तरीके भी इस्तेमाल किए जाते हैं। WHO विशेष रूप से बताता है कि युवाओं को आकर्षक शराब मार्केटिंग से बचाना सार्वजनिक स्वास्थ्य की महत्वपूर्ण चिंता है।

WHO के अनुसार शराब के विज्ञापन और मार्केटिंग के संपर्क से कम उम्र में शराब को स्वीकार करने की प्रवृत्ति तथा पीने के व्यवहार पर प्रभाव पड़ सकता है।

यहीं पर हमारे नशामुक्ति अभियान की सबसे बड़ी चुनौती सामने आती है।

एक तरफ स्कूल का संदेश है—“नशे से दूर रहो।”
दूसरी तरफ बाजार का संदेश है—“उत्पाद खरीदो।”

इन दोनों संदेशों की ताकत में भारी अंतर है।

फिल्म और विज्ञापन भी सामाजिक वातावरण बनाते हैं

फिल्मों और धारावाहिकों में शराब पार्टियों, धूम्रपान या नशे से जुड़े दृश्य कई बार कहानी के हिस्से के रूप में दिखाई देते हैं। दूसरी ओर तंबाकू और शराब से जुड़े ब्रांडों का प्रत्यक्ष विज्ञापन कानूनी प्रतिबंधों के अधीन है, जिसके कारण ब्रांड प्रमोशन के दूसरे रूपों पर भी लगातार नियमन की जरूरत रहती है।

भारत में तंबाकू विज्ञापन पर COTPA, 2003 के तहत प्रतिबंध है। केंद्र सरकार के राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम के अनुसार तंबाकू उत्पादों के विज्ञापन और प्रचार को नियंत्रित करने के लिए कानून और नियम मौजूद हैं।

लेकिन कानून का होना और उसका प्रभावी पालन होना दो अलग-अलग बातें हैं।

यही कारण है कि स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम के साथ-साथ दुकानों, विज्ञापन माध्यमों, डिजिटल प्लेटफॉर्म और बिक्री के स्थानों की निगरानी भी उतनी ही जरूरी है।

बच्चों के आसपास का वातावरण बदले बिना नशामुक्ति अधूरी रहेगी

WHO शराब नियंत्रण के संदर्भ में जिस वातावरण की चर्चा करता है, उसमें शराब की उपलब्धता, बिक्री केंद्रों की अधिकता, कीमत और विज्ञापन जैसे कारक शामिल हैं। युवाओं के निर्णय उनके आसपास के सामाजिक और व्यावसायिक वातावरण से प्रभावित होते हैं।

इसलिए किसी विद्यालय की दीवार पर “नशामुक्त क्षेत्र” लिख देना पर्याप्त नहीं है।

जरूरत इस बात की है कि विद्यालय के आसपास के क्षेत्र को भी वास्तव में बच्चों के लिए सुरक्षित बनाया जाए।

तंबाकू उत्पादों की बिक्री के संबंध में भारत में कानून पहले से मौजूद है। राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम के अनुसार शैक्षणिक संस्थानों के आसपास तंबाकू बिक्री और अन्य प्रावधानों को नियंत्रित करने के लिए COTPA के प्रावधान लागू हैं।

इसलिए सवाल केवल कानून बनाने का नहीं, स्थानीय स्तर पर उसके नियमित निरीक्षण और प्रभावी क्रियान्वयन का भी है।

नशा और अपराध: संबंध है, लेकिन आंकड़ों को सावधानी से पढ़ना होगा

नशे को अपराधों की हर घटना का अकेला कारण मानना सही नहीं होगा। अपराध के पीछे बेरोजगारी, गरीबी, पारिवारिक परिस्थितियां, सामाजिक तनाव, मानसिक-सामाजिक कारक और अनेक अन्य कारण भी हो सकते हैं।

लेकिन शराब और हिंसा, दुर्घटनाओं तथा अन्य चोटों के बीच संबंध को अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक साहित्य में अच्छी तरह दर्ज किया गया है।

WHO के अनुसार 2019 में विश्व स्तर पर शराब से जुड़ी लगभग 2.6 मिलियन मौतें हुईं। इनमें लगभग 7 लाख मौतें चोटों से संबंधित थीं और शराब से संबंधित मौतों का सबसे बड़ा अनुपात 20-39 वर्ष की आयु के लोगों में था।

इसलिए नशामुक्ति केवल स्वास्थ्य विभाग का विषय नहीं है। यह शिक्षा, पुलिस, परिवहन, महिला एवं बाल सुरक्षा, सामाजिक न्याय और स्थानीय प्रशासन—सभी से जुड़ा प्रश्न है।

सरकार की मुहिम को भी बदलना होगा

नशामुक्त भारत अभियान को केवल “शपथ दिलाओ और फोटो अपलोड करो” वाली गतिविधि बनने से बचाना होगा।

स्कूलों में वर्ष में एक दिन कार्यक्रम करने के बजाय पूरे वर्ष चलने वाला कार्यक्रम होना चाहिए।

पहला— विद्यार्थियों के लिए आयु-उपयुक्त वैज्ञानिक नशामुक्ति शिक्षा हो।

दूसरा— शिक्षकों को केवल पोस्टर लगाने की जिम्मेदारी न देकर उन्हें पहचान, परामर्श और रेफरल की प्रशिक्षण व्यवस्था दी जाए।

तीसरा— विद्यालय के आसपास तंबाकू बिक्री संबंधी नियमों का नियमित निरीक्षण हो।

चौथा— शराब और तंबाकू के अप्रत्यक्ष, डिजिटल तथा ब्रांड-विस्तार वाले प्रचार की निगरानी मजबूत हो।

पांचवां— जिन विद्यार्थियों में नशे की शुरुआत हो चुकी है, उन्हें केवल डांटा न जाए; उन्हें गोपनीय परामर्श और उपचार सेवाओं से जोड़ा जाए।

छठा— नशामुक्ति अभियान के लिए वास्तविक बजट हो। केवल आदेश जारी करके विद्यालयों से परिणाम की अपेक्षा करना पर्याप्त नहीं है।

सरकार को राजस्व और समाज को स्वास्थ्य—दोनों का हिसाब रखना होगा

शराब से मिलने वाला आबकारी राजस्व एक वास्तविक आर्थिक तथ्य है। लेकिन नशे से जुड़ी बीमारी, उपचार, दुर्घटना, कार्यक्षमता में कमी और परिवारों पर पड़ने वाले प्रभाव भी वास्तविक सामाजिक लागत हैं।

इसलिए नीति की सफलता केवल इस आधार पर नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने स्कूलों में शपथ दिलाई गई, कितने पोस्टर लगाए गए या कितनी गतिविधियां पोर्टल पर दर्ज हुईं।

सवाल यह होना चाहिए—

कितने बच्चों ने तंबाकू शुरू नहीं किया?
कितने युवाओं ने शराब या अन्य नशीले पदार्थों से दूरी बनाई?
कितने निर्भर लोगों को उपचार मिला?
कितने बिक्री केंद्रों पर कानून का पालन हुआ?
और नशे से संबंधित नुकसान में वास्तव में कितनी कमी आई?

यही किसी भी नशामुक्ति अभियान की वास्तविक परीक्षा होनी चाहिए।

अंततः सवाल एक बोर्ड का नहीं, पूरे वातावरण का है

स्कूल की दीवार पर “धूम्रपान निषिद्ध क्षेत्र” का बोर्ड जरूरी है, लेकिन उसके बाहर का वातावरण भी उसी संदेश को मजबूत करे, यह उससे कहीं ज्यादा जरूरी है।

यदि बच्चे को स्कूल में नशे के नुकसान बताए जाएं और स्कूल से कुछ दूरी पर उसे उसी नशे की आकर्षक बिक्री दिखाई दे, यदि शिक्षक उसे नशे से बचने की शपथ दिलाए और मनोरंजन की दुनिया में नशे को ग्लैमर के साथ प्रस्तुत किया जाए, तो केवल शपथ से बदलाव की उम्मीद करना कठिन है।

नशामुक्त भारत का अभियान कागज, पोर्टल और शपथ से आगे बढ़कर बाजार, मीडिया, परिवार, विद्यालय और प्रशासन के संयुक्त अभियान में बदलना होगा।

क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बच्चों को नशे से कैसे बचाया जाए।

सवाल यह भी है कि—

हम बच्चों के सामने कैसा समाज और कैसा बाजार खड़ा कर रहे हैं?

और शायद नशामुक्त भारत की असली शुरुआत इसी सवाल का ईमानदारी से जवाब देने से होगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Some asteroids have us in their sights. Be nice to sort of go near them and find out what they’re made.

Subscribe Our Newslatter

Signup for our Newsletter and stay informed Some asteroids have us in their

Copyright © Sochbadlonow 2025. All rights reserved