जातिवाद, भ्रष्टाचार, महिला अपराध, गरीबी और भुखमरी के रावण कब जलेंगे?
हर साल विजयादशमी का पर्व पूरे देश में बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है। जगह-जगह रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के विशाल पुतले बनाए जाते हैं। हजारों की संख्या में लोग एकत्र होते हैं, आतिशबाजी होती है और कुछ ही पलों में आग की लपटों के बीच रावण का पुतला राख में तब्दील हो जाता है। लोग इसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक मानकर खुशियां मनाते हैं। लेकिन एक सवाल है, जो हर साल रावण के पुतले के साथ जलने के बजाय हमारे समाज के सामने खड़ा रह जाता है—क्या सचमुच बुराई समाप्त हो रही है, या हम केवल बुराई के एक प्रतीक को जलाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर रहे हैं?
यदि रावण का पुतला जलाना ही बुराई को समाप्त करने का उपाय होता, तो सदियों से मनाई जा रही विजयादशमी के बाद आज हमारा समाज अन्याय, शोषण, भेदभाव और अपराधों से मुक्त हो चुका होता। लेकिन वास्तविकता हमारे सामने है। रावण के पुतले हर साल जलते हैं, मगर सामाजिक बुराइयों के अनेक चेहरे आज भी हमारे बीच मौजूद हैं।
समाज में आज भी जिंदा हैं रावण के दस सिर
रामायण का रावण एक पौराणिक पात्र है, लेकिन आधुनिक समाज में बुराइयों के ऐसे अनेक रूप दिखाई देते हैं, जिनका विनाश किए बिना वास्तविक विजयादशमी की कल्पना अधूरी है।
जातिवाद का रावण: आज भी जाति के आधार पर मनुष्यों की योग्यता, सम्मान और सामाजिक हैसियत तय करने की कोशिश होती है। कहीं जाति के नाम पर भेदभाव है, कहीं सामाजिक बहिष्कार, तो कहीं जातिगत हिंसा। संविधान ने सभी नागरिकों को समानता और गरिमा का अधिकार दिया है, फिर भी जाति की दीवारें समाज को बांट रही हैं। जिस दिन व्यक्ति की पहचान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके मानवीय गुणों और कर्मों से होगी, उसी दिन जातिवाद के रावण पर वास्तविक विजय होगी।
भ्रष्टाचार का रावण: सरकारी कार्यालयों से लेकर सार्वजनिक जीवन तक भ्रष्टाचार की शिकायतें व्यवस्था और जनता के विश्वास को कमजोर करती हैं। रिश्वतखोरी, पद का दुरुपयोग और सार्वजनिक धन की लूट केवल आर्थिक अपराध नहीं हैं, बल्कि उन गरीबों और वंचितों के अधिकारों पर भी चोट हैं, जिन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए।
महिलाओं के विरुद्ध अपराध का रावण: एक ओर हम देवी की पूजा करते हैं, दूसरी ओर महिलाओं के साथ हिंसा, उत्पीड़न, दहेज प्रताड़ना और यौन अपराधों की घटनाएं समाज के सामने गंभीर सवाल खड़े करती हैं। महिलाओं की सुरक्षा केवल नारों और उत्सवों से सुनिश्चित नहीं होगी। इसके लिए समानता की सोच, प्रभावी कानून, त्वरित न्याय और घर से लेकर सार्वजनिक स्थानों तक सम्मानजनक व्यवहार आवश्यक है।
राजनीति के अपराधीकरण का रावण: लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों से ईमानदारी, जवाबदेही और जनसेवा की अपेक्षा की जाती है। लेकिन जब राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि, धनबल और बाहुबल को बढ़ावा मिलता है, तो लोकतांत्रिक मूल्यों को नुकसान पहुंचता है। राजनीति को जनसेवा का माध्यम बनाना और आपराधिक आचरण के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करना समय की मांग है।
गरीबी और भुखमरी का रावण: जिस देश में विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहां किसी परिवार का भूखे सोना, किसी बच्चे का शिक्षा से वंचित रहना और किसी जरूरतमंद का इलाज न करा पाना हमारे विकास की दिशा पर प्रश्नचिह्न लगाता है। आर्थिक प्रगति का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुंचा है।
कुपोषण का रावण: बच्चों को पर्याप्त और पौष्टिक भोजन न मिलना केवल परिवार की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और सार्वजनिक व्यवस्था की चुनौती है। कुपोषण बच्चों के शारीरिक विकास, सीखने की क्षमता और भविष्य को प्रभावित करता है। इस रावण का अंत पौष्टिक भोजन, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं, स्वच्छ पेयजल और प्रभावी जनकल्याणकारी योजनाओं से ही संभव है।
इनके अतिरिक्त अंधविश्वास, पाखंड, नशाखोरी, बेरोजगारी, धार्मिक उन्माद, पर्यावरण प्रदूषण और शिक्षा में असमानता भी ऐसी चुनौतियां हैं, जिनसे समाज को लगातार संघर्ष करना होगा।
क्या आतिशबाजी और प्रदूषण ही विजयादशमी की उपलब्धि है?
रावण दहन के आयोजनों में भारी मात्रा में सामग्री का उपयोग होता है। पुतलों के निर्माण में प्रयुक्त पदार्थों, आतिशबाजी और जलने से निकलने वाले धुएं का पर्यावरण पर प्रभाव पड़ सकता है। इसका स्तर आयोजन में इस्तेमाल की गई सामग्री और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
जब वायु प्रदूषण पहले से ही स्वास्थ्य के लिए चुनौती बना हुआ है, तब यह विचार करना जरूरी है कि त्योहारों को पर्यावरण के अनुकूल कैसे बनाया जाए। उत्सव मनाना हमारी सांस्कृतिक स्वतंत्रता और सामाजिक परंपरा का हिस्सा है, लेकिन उत्सव के साथ पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के प्रति जिम्मेदारी भी जुड़ी होनी चाहिए।
सवाल रावण का पुतला जलाने का विरोध करना नहीं, बल्कि यह समझना है कि प्रतीकात्मक बुराई के दहन के साथ वास्तविक बुराइयों के खिलाफ भी कोई ठोस कदम उठाया जा रहा है या नहीं।
यदि हम हर साल लाखों रुपये पुतले बनाने और जलाने पर खर्च कर सकते हैं, तो समाज की सामूहिक भागीदारी से गरीब बच्चों की शिक्षा, जरूरतमंदों के भोजन, पौधरोपण, महिला सुरक्षा जागरूकता और सामाजिक समानता के कार्यक्रमों को भी प्रोत्साहित कर सकते हैं। सांस्कृतिक आयोजन और सामाजिक कल्याण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं; दोनों साथ चल सकते हैं।
राम की विजय का संदेश केवल रावण दहन नहीं
विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में देखा जाता है। इस संदेश का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा, जब हम इसे अपने आचरण और सामाजिक व्यवस्था में उतारें।
यदि कोई व्यक्ति रावण का पुतला जलाकर घर लौटता है, लेकिन जाति के नाम पर किसी मनुष्य का अपमान करता है, तो क्या उसने बुराई पर विजय प्राप्त कर ली?
यदि कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ भाषण देता है, लेकिन स्वयं रिश्वत लेता या देता है, तो क्या उसका उत्सव उसे नैतिक बना देता है?
यदि हम महिला सम्मान के नारे लगाते हैं, लेकिन घर और समाज में महिलाओं को बराबरी का अधिकार नहीं देते, तो क्या हमारा उत्सव पूर्ण है?
यदि हम धार्मिक आस्था के नाम पर लाखों रुपये खर्च करते हैं, लेकिन अपने आसपास भूखे बच्चों और जरूरतमंद परिवारों की पीड़ा के प्रति संवेदनहीन बने रहते हैं, तो हमें अपने सामाजिक दायित्व पर विचार करना चाहिए।
धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का मूल्यांकन केवल उनके बाहरी स्वरूप से नहीं, बल्कि उनसे मिलने वाली नैतिक प्रेरणा और समाज पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभाव से भी किया जाना चाहिए।
आइए, इस विजयादशमी पर एक नई शुरुआत करें
इस बार रावण का पुतला जलाने के साथ अपने भीतर और अपने आसपास मौजूद बुराइयों को समाप्त करने का संकल्प भी लें।
● जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करेंगे।
● भ्रष्टाचार और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाएंगे।
● महिलाओं की गरिमा, स्वतंत्रता और समानता का सम्मान करेंगे।
● भूखे और जरूरतमंद लोगों की सहायता करेंगे।
● बच्चों के पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता देंगे।
● अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों के स्थान पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देंगे।
● पर्यावरण की रक्षा करते हुए उत्सव मनाएंगे।
● अपराध और अन्याय करने वाले व्यक्ति को उसकी पहचान या राजनीतिक हैसियत के आधार पर संरक्षण नहीं देंगे।
यह काम केवल सरकार का नहीं है। सरकार, प्रशासन, न्याय व्यवस्था, शैक्षणिक संस्थानों, सामाजिक संगठनों और प्रत्येक नागरिक की अपनी भूमिका है। सामाजिक परिवर्तन के लिए नीतियां भी चाहिए, कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन भी और नागरिकों के व्यवहार में बदलाव भी।
निष्कर्ष: पुतले नहीं, बुराइयां जलनी चाहिए
रावण के पुतले का दहन एक प्रतीक है। लेकिन प्रतीक तभी सार्थक होता है, जब वह हमें वास्तविक परिवर्तन के लिए प्रेरित करे। हर साल रावण के हजारों पुतले जलाने के बाद भी यदि जातिवाद, भ्रष्टाचार, महिला उत्पीड़न, गरीबी, भुखमरी और कुपोषण कायम हैं, तो हमें उत्सव के उद्देश्य पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी पुतले को जलाना आसान है, लेकिन अपने भीतर की नफरत, लालच, भेदभाव और अन्याय की प्रवृत्तियों को समाप्त करना कठिन है। समाज में व्याप्त बुराइयों का अंत केवल नारों से नहीं, बल्कि शिक्षा, वैज्ञानिक सोच, सामाजिक न्याय, संवैधानिक मूल्यों और ठोस सामूहिक प्रयासों से होगा।
जिस दिन जातिवाद का अंत होगा, भ्रष्टाचार कमजोर पड़ेगा, महिलाओं को भयमुक्त जीवन मिलेगा, कोई बच्चा भूखा नहीं सोएगा और हर बच्चे को पौष्टिक भोजन तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलेगी—उस दिन विजयादशमी का संदेश वास्तविक अर्थों में साकार होने की दिशा में आगे बढ़ेगा।
क्योंकि असली विजयादशमी वह नहीं, जब केवल रावण का पुतला जल जाए; असली विजयादशमी वह है, जब मनुष्य के भीतर की बुराई हारे और समाज में न्याय, समानता, करुणा तथा मानवता की जीत हो।
सोच बदलो, समाज जगाओ।
— आई. पी. ह्यूमन
