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अलबर्ट आइंस्टाइन:अंध-देश भक्ति और जातिवाद इन 2 बातों से थे बहुत खिन्न जानें a Big story

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दुनियाँ में बहुत बड़े आविष्कारक और महान वैज्ञानिक पैदा हुए हैं.लेकिन बिरले ही ऐसे वैज्ञानिक रहे होंगे जिन्होंने विज्ञान के साथ-साथ समाज और राजनीति पर भी अपनी पैनी निगाह रखी,और अंधविश्वास से भरे समाज की आँखें खोलने में क्रांतिकारी कदम उठाए.ऐसे महान वैज्ञानिक हैं,सर अलबर्ट आइंस्टाइन.इनका जन्म् 14 मार्च 1879 को जर्मनी के उल्म,में हुुवा था.

अलबर्ट आइंस्टाइन
अलबर्ट आइंस्टीन

आइंस्टीन आधुनिक भौतिक के प्रणेता हैैं. थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी के लिए 1921 में इनको भौतिकी का नोवल पुरस्कार मिला.आइंस्टीन एक भावुक, प्रतिबद्ध जातिवाद विरोधी थे, और प्रिंसटन में नेशनल एसोसिएशन ऑफ द एडवांसमेंट ऑफ कलर्ड पीपल (एनएएसीपी) संस्था के सदस्य भी थे, जहां उन्होंने अफ्रीकी अमेरिकियों के नागरिक अधिकारों के लिए अभियान में हिस्सा भी लिया.वे जातिवाद को अमेरिका की “सबसे खराब बीमारी” मानते थे.

अलबर्ट आइंस्टाइन ने क्यों छोड़ी जर्मन नागरिकता??

महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाइनस्टीन युद्ध और सैन्यवाद से नफरत और घृणा करते थे.अपनी युवावस्था में अलबर्ट आइंस्टीन ने सैन्यवाद और सैन्य शासनकाल को देखा था.सैन्यवाद की घुटन ने उनको जर्मनी की नागरिकता छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया ,और स्विस नागरिकता पाने के लिए आवेदन किया.

राजनीति में आइंस्टीन के कदम

एक ओर अलबर्ट आइंस्टाइन वैज्ञानिक अनुसन्धानों में व्यस्त थे,वहीं दूसरी तरफ प्रथम विश्वयुद्ध ने दुनियाँ में दहशत मचा रखी थी.विश्वयुद्ध से खिन्न होकर आइंस्टाइन ने सीधे राजनीति में अपने कदम रखे.जर्मनी ने जब बेल्जियम परआक्रमण किया तो 93 जर्मन बुद्धिजीवियों ने जर्मनी के इस कदम को उचित ठहराया और ‘सभ्य विश्व का घोषणा-पत्र’नाम के एक समूह ने हस्ताक्षर किए थे.आइंस्टीन ने तीन अन्य बुद्धिजीवियों के साथ मिलकर इस घोषणा -पत्र का विरोध किया था .उन्होंने सभी महाद्वीपों को जोड़ने और शान्ति के प्रयास के लिए यूरोपवासियों का घोषणा-पत्र जारी किया.वे ‘न्यू फादरलैंड लीग’समूह से जुड़ गए.आइंस्टीन का नाम बर्लिन पुलिस ने ब्लैक लिस्ट में डाल दिया था.इस समुह के सदस्यों को पासपोर्ट के लिए आवेदन करने से पूर्व सैन्य अधिकारियों से अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया था.

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अंध-देशभक्ति और जातिवाद से खपा थे अलबर्ट आइंस्टाइन:

यह केवल समाजवाद ही नहीं था जिसेसे आइंस्टाइन चिंतित थे. वे जीवन भर अज्ञानता तथा रूढ़िवाद, और विशेष रूप से अन्ध- देश भक्ति तथा जातिवाद के सभी रूपों के विरोधी थे. जैसे ही वे एक प्रवासी के रूप में 1930 के दशक में अमेरिका में आए, वे अलबामा में जातिवाद के शिकार 9 पीड़ित स्कॉट बोरो लड़कों के बचाव में आगे आए .वर्ष 1946 में उन्होंने पाल रॉबसन(Paul Robeson)के साथ मिलकर अमेरिकियों का ऐसा समूह बनाया, जो लोगों पर बिना मुकदमा चलाए उन्हें फांसी देने का विरोधी और अमेरिका में और अश्वेत लोगों के नागरिक अधिकार आंदोलन का समर्थक था.

सिद्धांतों के रूप में उनकी समझ वैज्ञानिक क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि इससे सार्वजनिक मामलों के बारे में उनका दृष्टिकोण भी विकसित हुआ. राष्ट्र और देशभक्ति ने आइंस्टाइन मे इतनी तीव्र भावना नहीं जगाई.आखिरकार उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध से पहले हालैंड के प्रसिद्ध भौतिक विद लारेंस को लिखा था,” लोग सदैव कुछ मुर्ख कल्पना चाहते हैं जिसके नाम पर वे एक-दूसरे का सामना कर सकें. कभी यह धर्म था. अब यह राज्य है”. ब्लुमेन्फेल्ड ,प्रमुख यहूदी जो अलग यहूदी स्वदेश की योजना बना रहा था, सहायता के लिए आया था,एलबर्ट आइंस्टाइन धार्मिक पहचान को राष्ट्र से जोड़ने वाली सियोनवादी अभिलाषा से प्रभावित नहीं हुए.युद्ध की वजह से सभी राष्ट्रों के प्रति घृणा काफी हो गई थी .प्रतिष्ठित यहूदी होने के कारण द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में आइंस्टाइन यहूदी स्वदेश की समस्या में स्वाभाविक रूप से सम्मिलित हो गया था.फिलिस्तीन में ब्रिटिश शासनादेश पर संयुक्त एंग्लो-अमेरिकी समिति के सामने 11 जनवरी, 1946 को गवाही देते हुए अरबी लोगों और यहूदियों के लिए अलग-अलग दो शासनादेशों के लिए ब्रिटिश नीतियों की उन्होंने गंभीर रूप से आलोचना की थी जिसमें फिलिस्तीन के हितों एवं समन्वय के विपरीत, भीड़ में उपस्थित सियोनवादियों के लिए चेतावनी अधिक थी.

यह सियोनवाद के इस मुद्दे से जुड़ा हुआ था कि उसके विचार सर्वाधिक विवादास्पद थे .यद्यपि वह एक गैर -पेशा यहूदी था और वह जानता था कि यहूदी मत के लोगों पर मुकदमा चलाया जाएगा .यह उसके लिए प्रिय विषय था और बर्लिन में सत्येन बोस के साथ हुई. उनकी बैठक भारत की स्वतंत्रता तथा यहूदियों के लिए प्रस्तावित स्वदेश पर ज्यादा केंद्रित थी.हीटलर के सत्ता में आने के पश्चात बदनामी वाली उपाधि जो उन्हें नाजी से मिली थी, उसके कारण जन्म के समय एक बार उनका घर नष्ट हो गया था जिससे उनकी यह धारणा अधिक बलवती हो गई . आइंस्टाइन ने इजराइल के बनने का समर्थन किया था, यद्यपि वे अरब लोगों के विस्थापन पर तटस्थ थे और इस नए गठित राज्य के राष्ट्रपतित्व को स्वीकार करने से मना कर दिया था. दूसरा कारण जिसने उन्हें यहुदी राज्य का समर्थक बनाया था वह यहूदी विद्वत्ता की परंपरा के लिए उनका गहरा आदर था. उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि एक बार इजराइल राज्य एक ऐसी सच्चाई बने जहां अरबी लोग और यहूदी शांति-समन्वय के साथ रह सकें. उन्हें पूर्व में कहा था,” हमारे जीवन की दौड़ में वास्तव में मूल्यवान क्या है, वह राष्ट्र नहीं बल्कि अतिसंवेदनशील विशिष्ट, व्यक्तित्व है “.आइंस्टीन ने राष्ट्रवाद तथा जातीय संकीर्ण कट्टरता से ऊपर उठकर उन्होंने रोना रोया,” यह मैं कैसे चाह सकता हूं कि ऐसे लोगों के लिए कहीं एक दीप वह जो विद्वान एवं सदभाव वाले हैं और इस प्रकार के स्थान पर मैं भी एक उत्साही देशभक्ति रहूं”

राज्य के विषय में आइंस्टाइन का मत

राज्य मनुष्य के लिए होता है,राज्य मनुष्य के लिए नहीं.यही विज्ञान के लिए कहा जा सकता है.ये पुराने वाक्यांश हैं,जो उन लोगों ने बनाये हैं जिन्होंने मानवीय व्यक्तित्व में उच्चतम मानवीय मूल्य देखे थे.मैं उन्हें दोहराने का इच्छुक नहीं हूं,लेकिन इसकी चर्चा इसलिए आवश्यक है क्योंकि इस बात का अधिकाधिक खतरा है कि संगठित ज्ञान एवं रूढ़िबद्ध ज्ञान के वर्तमान समय में लोग इन्हें भूल न जाये.

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I am I.P.Human My education is m.sc.physics and PGDJMC I am from Uttarakhand. I am a small blogger

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