डॉ0 भीमराव अंबेडकर ने कहा है:-“शिक्षा शेरनी का दूध है जो पियेगा ओ दहाड़ेगा”शिक्षा ही वह विशेष चीज है जो मानव को अन्य जीवों से अलग करती है.बदलते भौतिकवादी दौर में शिक्षा के उद्देश्य भी बदले नजर आने लगे हैं.आज स्थिति ऐसी है कि जब शिक्षा की बात होती है तो उसकी पूर्णता को व्यक्त करने के लिए ‘बहुमुखी शिक्षा का जिक्र होता है.आज के इस आर्टिकल में हम एक रोचक कहानी के माध्यम से “बहुमुखी शिक्षा“के महत्व पर चर्चा करने वाले हैं.इस कहानी के पात्र कोई छात्र/छात्रायें नहीं अपितु जानवर और पशु-पक्षी हैं.लेकिन कहानी शुरू करने से पहले संक्षिप्त में भारत की शिक्षा व्यवस्था पर एक नजर डालते हैं.

वैदिक कालीन भारत में शिक्षा:

भारत की शिक्षा व्यवस्था का इतिहास बहुत पुराना है.वैदिक काल में शिक्षा गुरुकुल में होती थी.शिष्यों को शास्त्रों का पाठ पढ़ाया जाता था.वेद,पुराणों और उपनिषदों का अध्ययन कराया जाता था.इस काल की एक प्रमुख विशेषता ये थी कि छात्रों को उनकी रुचि और लगन के अनुरूप अन्य कलाएं भी सिखाई जाती थीं.जैसे संगीत,धनुर्विद्या, और मन्त्रों की शिक्षा दी जाती थी.उस वक्त शिक्षा का उद्देश्य नौकरी करना नहीं था,बल्कि सिर्फ ज्ञानार्जन करना था.एक बात और शिक्षा सिर्फ कुलीन लोगों और उच्च वर्ण के लोगों के लिए ही होती थी.हिन्दू शास्त्रों में कई ऐसे उद्धरण हैं,जो ये जाहिर करता है कि वैदिक भारत से लेकर आधुनिक भारत में वर्णव्यवस्था व्याप्त थी.शम्भूक ऋषि ,एकलव्य से लेकर डॉ आंबेडकर और रोहित वेमुला तक वर्णव्यवस्था का शिकार हुए.ऐसा नहीं कि इन लोगों के पास प्रतिभा नहीं थी,ये बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे,लेकिन सामाजिक वर्गीकरण ने इनको गरीब और अछूत बना डाला.

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बहुमुखी शिक्षा क्या है?(What is a Broad -Based education)

बहुमुखी शिक्षा पर जानें पशुओं की1 रोचक कहानी
फोटो साभार gettyimages

बहुमुखी शिक्षा से ये आशय है कि व्यक्ति को सभी कलाओं,शिक्षा और अन्य सभी क्षेत्रों में निपुण होना चाहिए.मगर ऐसा कम ही दिखने को मिलता है कि कोई व्यक्ति संगीत में निपुण है तो वह खेलों में भी उतना ही निपुण होगा,कोई वगक्ति पढ़ाई में अच्छा हो सकता मगर जरूरी नहीं कि वह ,कला,खेल और संगीत के भी अच्छा ज्ञान रखता हो.वर्तमान शिक्षा व्यवस्था ज्ञान के लिए नहीं वरन रोजगार के लिए ली जाती है.यहां रुचियों के कोई खयाल नहीं रखा जाता है.आधुनिक प्रतिस्पर्धा के दौर में एक ही विषय की पढ़ाई से कुछ हांसिल होने वाला नहीं है.संघ लोकसेवा आयोग हो या,राज्य लोकसेवा आयोग,या कोई भी प्रतियोगी परीक्षा हो अभ्यर्थी को सभी विषयों का ज्ञान होना जरूरी है.

कहानी बहुमुखी शिक्षा की:(AStory of Versatile Education)

आइये जानते हैं बहुमुखी शिक्षा क्या है?जंगल के जानवरों के स्कूल की घटना:-

एक जंगल में कुछ जानवरों ने स्कूल शुरू करने का फैसला किया. छात्रों में एक चिड़िया, एक गिलहरी, एक मछली, एक कुत्ता, एक खरगोश और दिमागी तौर पर कमजोर ईल मछली शामिल थे.

पाठ्यक्रम(Curriculum) तय करने के लिए एक बोर्ड बनाया गया. बोर्ड ने तय किया कि छात्रों को भूमि की शिक्षा दी जाएगी और उन्हें उड़ना, पेड़ पर चढ़ना, उतरना एवं बिल खोदना सिखाया जाएगा. हर जानवर को सभी तालीम हासिल करने की पाबंदी थी.

चिड़िया उड़ान भरने में माहिर थी. उसने इस विषय में ‘ए ‘ग्रेड(‘A’Grade) हासिल किया, लेकिन जब बिल खोदने की बारी आई तो वह अपनी चोंच और पंख तोड़ बैठी और असफल साबित होने लगी. इस नाकामयाबी का उस पर ऐसा असर पड़ा कि जल्दी ही उसे उड़ान भरने में भी सी-ग्रेड (‘C’ grade’s)मिलने लगा .पेड़ पर चढ़ने और उतरने में तो वह फेल ही हो गयी.

गिलहरी पेड़ पर चढ़ने में काफी कुशल थी, लेकिन वह तैरने में असफल हुई. मछली सबसे अच्छी तैराक थी, लेकिन वह पानी के बाहर निकल ही नहीं सकती थी, इसलिए बाकी सभी विषयों में फेल हो गयी. कुत्ता स्कूल गया ही नहीं, उसने फीस भी जमा नहीं की, और प्रबंधकों से इस बात को लेकर झगड़ता रहा कि पाठ्यक्रम में भोंकना भी शामिल किया जाए.

खरगोश को बिल खोदने में ‘ए'(A Grade) ग्रेड मिला लेकिन उसके लिए पेड़ पर चढ़ना एक बहुत बड़ी समस्या थी. वह बार-बार असफल होता रहा, और 1 दिन जमीन पर इस प्रकार बुरी तरह गिरा कि उसे ब्रेन डैमेज हो गया. वह बच तो गया, लेकिन उसके दिमाग पर ऐसा असर पड़ा था कि उसे बिल खोजने में भी दिक्कत होने लगी, और उसे इस विषय में भी ‘सी’ ग्रेड मिलने लगा.

आखिरकार, दिमागी तौर पर बीमार ईल को जिसने हर काम आधे-अधूरे ढंग से किया था, कक्षा का सबसे उत्तम छात्र घोषित कर दिया गया ,बोर्ड ख़ुश था कि हर छात्र को बहुमुखी शिक्षा मिल रही थी.

सोच बदलो:अपनी क्षमता को जानो:

सभी के पास कुछ न कुछ प्रतिभा छुपी होती है.लेकिन हमको अपने बारे में जानने और परखने की फुर्सत ही कहाँ है .शिक्षा व्यवस्था भी रुचिपरक नहीं है.अगर बच्चे की रुचि के अनुरूप शिक्षा दी जाए तो हो सकता है वह अच्छी सफलता पा ले.आज बेरोजगारी जनसंख्या वृद्धि के कारण नहीं बल्कि बच्चे को उसकी अभिरुचि के अनुसार शिक्षा का न होना है.जिसके पास जो क्षमता है उसी को विकसित करो, अपने को जानो और अपने आप को परखो:

सोच बदलो:अपनी क्षमता को जानो:

सभी के पास कुछ न कुछ प्रतिभा छुपी होती है.लेकिन हमको अपने बारे में जानने और परखने की फुर्सत ही कहाँ है .शिक्षा व्यवस्था भी रुचिपरक नहीं है.अगर बच्चे की रुचि के अनुरूप शिक्षा दी जाए तो हो सकता है वह अच्छी सफलता पा ले.आज बेरोजगारी जनसंख्या वृद्धि के कारण नहीं बल्कि बच्चे को उसकी अभिरुचि के अनुसार शिक्षा का न होना है.जिसके पास जो क्षमता है उसी को विकसित करो, अपने को जानो और अपने आप को परखो:

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