भारत के गणतंत्र का संकल्प 26 जनवरी 1930 को कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में लिया गया था. देश 1947 को ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी से मुक्त हुवा था.स्वतन्त्र राष्ट्र का संविधान 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन की कठोर मेहनत से बनकर तैयार हुआ.26 नवंबर 1949 को भारत का संविधान पूर्ण हुवा था . जिसको संविधान निर्माता डॉ बी0 आर0 अंबेडकर ने संविधान सभा को समर्पित किया था.भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हो गया.तब से हर वर्ष 26 जनवरी का दिन गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है.26 जनवरी 2021 को भारत को गणतंत्र राष्ट्र बने 71 साल पूर्ण हो गए हैं.अर्थात 7 दशक से हम भारत के गणतंत्र दिवस को धूमधाम से मनाते आ रहे हैं.तथा गणतंत्र राष्ट्र के नागरिक के तौर पर अपने को गौरवान्वित महसूस करते आ रहे हैं.

लेकिन हकीकत ये भी है कि सिर्फ भारत के गणतंत्र दिवस पर निकलने वाली झांकियां ही देेश की वास्ततविक तस्वीर नहीं हो सकती हैं.आज उन गहराइयों के बारे में विश्लेषण करने वाले हैं जो भारत के वास्तविक गणतंत्र की झांकियों को प्रदर्शित करते है.

Main Points

    भारत के गणतंत्र की कहानी

    गणतंत्र का अर्थ:

    गणतंत्र या जनतंत्र वह शासन प्रणाली होती है जिसमें जनता द्वारा ही देश की सरकार चुनी जाती है.संविधान देश की सबसे बड़ी धरोहर होती है जो नागरिकों के हितों के अनुरूप देश में न्याय और कानून को सर्वोपरि रखता है.संविधान ही गणतंत्र का इंजन होता है.संविधान से ऊपर न कोई व्यक्ति होता है और न हीं कोई संस्था.चाहे प्रधानमंत्री हो या राष्ट्रपति सभी संविधान के अधीन ही अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं.

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    भारत का गणतंत्र और RSS.

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    आजादी और गणतंत्र के बाद भारत की उपलब्धियां:

    सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत की उपलब्धियां भी कम नहीं हैं..अंतरिक्ष में भारत पहुंचा है,परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी भारत अग्रणी राष्ट्रों की कतार पर है.भारत के गणतंत्र की और भी कई उपलब्धियां है-

    भारत की सैन्य शक्ति बढ़ी है.सूचना क्रांति आयी है,कंप्यूटर क्रांति आयी है,खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हुवा है.यातायात के साधनों में अपार वृद्धि हुई है.लगभग देश के हर कोने में बिजली पहुंच गई है.साक्षरता दर में वृद्धि हुई है.इंटरनेट,मोबाइल,सूचनाक्रान्ति की नींव ने मोदी जी को डिजिटल इंडिया का concept दिया है.

    गणतंत्र राष्ट्र के नागरिक होने के नाते कहा जाए तो – जिस गांधी,नेहरू और कांग्रेस को कोसते-कोसते मोदी जी  और भाजपा के नेता  थकते नहीं है,उसी नेहरू ने आजादी और गणतंत्र के बाद नए भारत की नींव रखी.और उसी नेहरू खानदान और कांग्रेस ने इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की शहादत भी देश के लिए दी है.अंग्रेज तो भारत को कंगाली की हालत में छोड़कर गए थे .इसको 21 वीं सदी का भारत,न्यू इंडिया,डिजिटल इंडिया के करीब लाने का श्रेय धर्मनिरपेक्ष सरकारों को जाता है.

    आरएसएस और राष्ट्रीय ध्वज:

    जिस तिरंगे के नीचे स्वतन्त्रा संग्राम लड़ा गया,जिस तिरंगे की शान को बचाने के लिए हजारों देशभक्तों ने बलिदान दिया है .उस तिरंगे को ‘संघ’आरंभ में मनाता ही नहीं था.आजादी से 28 दिन पहले 17 जुलाई 1947 को आरएसएस के मुखपत्र ‘ ऑर्गनाइज़र’में “राष्ट्रीय ध्वज” हैडलाइन से संपादकीय लेख छपा था जिसमें ‘भगवा ध्वज’ को राष्ट्रीय ध्वज अपनाने की मांग की गई थी.यदि यह बात सत्य है कि- RSS तिरंगे के स्थान पर भगवाध्वज को राष्ट्रीय ध्वज अपनाना चाहता था तो लोकतन्त्र,संविधान और गणतंत्र आरएसएस के कमांडर भाजपा के लिये एक चुनावी राष्ट्रवाद के सिवा और क्या हो सकता है.

    भारत के राष्ट्रीय चिन्ह में गणतंत्र:

    भारत के गणतंत्र पर बुद्ध का प्रभाव
    भारत के राष्ट्र-ध्वज तिरंगा में स्थित अशोक चक्र

    राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे में समान अनुपात में तीन क्षैतिज पट्टियां हैं शीर्ष में केसरिया रंग देश की ताकत और साहस को दर्शाता है। बीच में स्थित सफेद पट्टी धर्म चक्र के साथ शांति और सत्य का प्रतीक है., हरा रंग देश के सुख, समृद्धि और विकास को दर्शाता है.तिरंगे के बीच में सफेद पट्टी में जो चक्र बना है उसमें 24 तिल्लियां हैं.जिसको अशोक के सारनाथ स्तंभ से लिया गया है.अशोक बौद्ध धर्म के अनुयायी थे.भारत का प्राचीन और विश्व का पहला गणतंत्र ईसा पूर्व छठी शताब्दी से उत्तर भारत में शुरू हो गया था.जब छोटे-छोटे गणराज्य अस्तित्व में आ गए थे.ये सभी गणराज्य ‘बुद्धमय ‘युग के गणराज्य थे.चन्द्रगुप्त मौर्य और अशोक के शासनकाल में भारत बृहद भारत बन चुका था.

    राष्ट्रीय ध्वज

    अशोक चक्र, सम्राट अशोक के समय से शिल्प कलाओ के माध्यम से अंकित किया गया था.धर्म-चक्र का अर्थ भगवन बुद्ध ने अपने अनेक प्रवचनों में अविद्या से दू:ख तक बारह अवस्थाये और दू:ख से निर्वाण (जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति) की बारह अवस्थाये बताई है.

    आज स्थिति ये है कि भारत की प्राचीन स्मृतियों को खत्म किया जा रहा है.बौद्ध धर्म से जुड़े इतिहास को समेटने की तैयारी चल रही है.देश के हर कोने में अंबेडकर की प्रतिमाओं को तोड़ा जा रहा है.और संविधान की बातों को नजरअंदाज कर धीरे-धीरे वैदिक भारत और मनु कालीन भारत की व्यवस्थाओं को लागू करने का खेल आरएसएस के नागपुर प्रयोगशाला में चल रहा है.इस बात की पुष्टि के लिए इस वर्ष भारत के गणतंत्र दिवस पर जो झांकिया दिखायी गयी थी,उनमें अव्वल स्थान पाने वाली झांकियां हिंदुत्व को दरसाने वाली थीं.

    गोडसे ज्ञानशाला की शुरुआत:

    राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को धीरे-धीरे अब एक देशभक्त और महापुरुष के रूप में मान्यता देने की पहल होने लगी है.इसका ताजा उदाहरण मध्यप्रदेश के ग्वालियर में ‘गोडसे ज्ञानशाला’के नाम से शिक्षण संस्थान खोला गया है.ज्ञात हो कि गोडसे और सावरकर हिन्दू महासभा और आरएसएस के सक्रिय सदस्य रहे हैं.

    सरकारी संस्थानों का निजीकरण:

    जिस अंदाज में ब्रिटिश ईस्टइंडिया कंपनी ने धीरे-धीरे भारत में अपने पैर जमाये और हिंदुस्तान को 2 शताब्दी तक गुलाम बनाये रखा,उसी धारा रेखीय परवाह से वर्तमान सरकार भी चल रही है.सरकारी उपक्रमों और संस्थानों को निजीकरण के चंगुल में डाला जा रहा है.नीतियां उधोगपतियों और कंपनियों के हितों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं.तीन कृषि बिल इस आसंका पर मुहर लगाती है.100 दिनों से से अधिक हो गए हैं,देश के किसान इन कृषि बिलों को वापस लेने की माग कर रही है,मगर सरकार इतनी हठधर्मी हो चुकी है कि ब्रिटिश हुकूमत भी सायद इतनी निरंकुश रही हो.कंपनी के शासन में जनता कैसे पिसती है,विगत 300 वर्षों का इतिहास गवाह है.

    अब सवाल उठता है कि निजीकरण का आरएसएस से और भारत के गणतंत्र से क्या संबंध है?इसी को गहराई से समझने की जरूरत है.

    सरकारी संस्थानों को निजी हाथों में बेचकर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह फेरना चाहती है.निजीकरण से एक महत्वपूर्ण चीज उभर कर सामने आई है वो है,सरकारी सेवाओं में sc,st,obc के लिए आरक्षण.आरएसएस के एजंडे में आरक्षण को खत्म करना प्रमुख है.इसका प्रमाण आरएसएस प्रमुख का ये कहना कि अब आरक्षण की समीक्षा करने का वक्त आ गया है.हिन्दू राष्ट्र की डिक्सनरी में आरक्षण शब्द है ही नहीं.

    अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश:

    भारत का संविधान देश के नागरिकों को मूल अधिकार प्रदान करता है.मूल अधिकारों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी शामिल है.लोकतन्त्र में यही जनता की प्रमुख आवाज होती है.आज हालात ये हैं कि सरकार की कमियों को उजागर करना,अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए आंदोलन करना,धरने प्रदर्शन करना देशद्रोही का काम हो गया है.यहां तक सोसल मीडिया पर भी सरकार अंकुश लगाने के फिराक में है.ये सब सोची समझी रणनीति का ही हिस्सा है.इन नीतियों को सरकार तय नहीं करती है बल्कि आरएसएस तय करती है.सरकार का काम तो चुनाव जीतना है.इतिहास के झरोखों में झांक कर देखें तो जिस देश में लोगों को बोलने की स्वतंत्रता नहीं है वहां राजतंत्र है.हिन्दू राष्ट्र का भी यही मतलब निकलता है.

    न्यायपालिका पर कब्जा:

    लोकतन्त्र के चार स्तंभ हैं कार्यपालिका, व्यवस्थापिका, न्यायपालिका तथा प्रेस.इन चार संस्थाओं से यह उम्मीद की जाती है कि ये लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को जीवित रखेंगी. आजकल दबी जुबान से ये सुनने में आता है कि देश की न्यायपालिका भी सरकार के दबाव में आकर फैसले सुनाने लगी है.ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे.

    मीडिया पर कब्जा:(दरबारी मीडिया)

    मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है.और मीडिया समाज का आँख और कान होती है.लेकिन 2014 के बाद मीडिया के बारे में ये परिभाषाएं बदल चुकी हैं.अब भारत का मीडिया,मुख्यतः इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ,लोकतन्त्र का नहीं वरन भाजपा और आरएसएस का right hand बन चुका है.अधिकांश न्यूज़ चैनल्स दरबारी चैनल बन चुके हैं.समाज की समस्याएं मीडिया को नहीं दिखती,बेरोजगारी मीडिया को नहीं दिखती,आग लगाती महंगाई मीडिया को नहीं दिखती,दलितों,महिलाओं,वंचितों की चीख मीडिया को नहीं सुनाई देती है.बस मीडिया को मोदी जी ,भाजपा और आरएसएस का एजेंडा ही दिखाई और सुनाई देती है.

    भारत के गणतंत्र को जिंदा रखना है तो कट्टरपंथी विचारधारा को त्यागना होगा.धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र ही हिंदुस्तान को प्रगति के पथ पर ले जा सकता है.कोरोना महामारी के समय लोग आक्सीजन के अभाव में तड़पकर दम तोड़ते रहे.उस वक्त धार्मिक मुद्दे,अंधविश्वास और न हैं मन्दिर,मस्जिद और मूर्तियां काम आयी.देश विज्ञान और वैज्ञानिक सोच से ही आगे बढ़ेगा.गांधी,नेहरू,अंबेडकर, लोहिया,पेरियार,फुले,विवेकानंद, ओशो ,एपीजे कलाम के विचार और भारतीय संविधान और धर्मनिरपेक्षता ही सुनहरे भारत के भविष्य के लिए काम आयंगे,न कि गोडसे और सावरकर.

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