गुरु नानक देव जी ने अपने तर्कों और ज्ञान से भारत में फैली कुरूतियों और अंधविश्वास पर गहरी चोट की थी.गुरु नानक देव उस वक्त पैदा हुए जब भारत में इस्लाम धर्म का बोलबाबा चरम सीमा पर था.साथ ही मध्यकालीन भारत में 15 वीं सदी भक्तिकाल की सदी रही है.इस काल में कई सन्त , कवि और समाज सुधारक पैदा हुुुए हैं.गुरु नानक साहेब ने एक नई राह चुनी.उन्होंने इस्लाम धर्म और हिंदू धर्म में व्याप्त अंधविश्वास को नकारा.बचपन से ही मानवता के प्रति उनके प्रेम ने उनको एक महान गुरु बना दिया.उन्होंने समता और बन्धुत्व को सिर्फ वाणी से ही नहीं कहा ,बल्कि इसके लिए हिंदू धर्म से पृथक एक नये संप्रदाय ‘सिक्ख पंथ की स्थापना की.

गुरु नानक देव जी एक ईश्वर और एक मानव की बात की।
गुरु नानक देव

गुरु नानक देव की जीवनी:

गुरु नानक का जन्म हिन्दू धर्म के खत्री कुल में कार्तिक पूर्णिमा जे दिन सन 1469 रावी नदी के किनारे तलवंडी गांव में हुवा था.पिता मेहता कल्याणराय खत्री तथा माताजी तृप्ता देवी थीं.इनकी बहन नानकी थी.बचपन से ही तर्क और ज्ञान के धनी नानक ने अपनी छाप छोड़नी शुरू कर दी थी.उन्होंने बड़े-बड़े पंडितों और विद्वानों को अपनी तर्क शक्ति और प्रश्नों से हतप्रभ कर दिया था.उनके जीवन से जुड़ी हजारों कहानियां और तथ्य हैं,जिसके कारण उनकी ख्याति निरन्तर बढ़ती गयी.उन्होंने हिंदू धर्म और इस्लाम धर्म के बीच एक सेतु का काम किया .18 वर्ष की आयु में उनका विवाह सुलक्खनी देवी से हुवा.

गुरु नानक से जुड़े हजारों रोचक तथ्य हैं.लेकिन जिस कारण उन्होंने हिंदू धर्म और इस्लाम पर तीखा प्रहार किया उसके 2 प्रेरक प्रसंग यहां देना ज्यादा सार्थक लगता है.पहला प्रसंग उपनयन संस्कार और जनेऊ धारण करने से जुड़ा है.

जनेऊ धारण करने से क्यों किया था इनकार?

हिन्दू धर्म में यज्ञोपवीत संस्कार सबसे उत्तम संस्कार माना जाता है .इसको उपनयन संस्कार भी कहते है.इसमें बालक का मुंडन कर उसके गले में जनेऊ पहनाया जाता है .माना जाता है कि उस संस्कार के उपरांत लड़के की वास्तविक शिक्षा आरंभ हो जाती है,और बालक के बुद्धि का विकास होता है.परन्तु गुरु नानक देव ने जनेऊ धारण करने से इनकार कर दिया था.जानते हैं उन्होंने क्या तर्क दिया था.

बालक नानक के पिता जी ने एक बार अपने पुत्र का यज्ञोपवीत कराने हेतु, कुटुंब और सगे-संबधियो को आमंत्रित किया. नानक आसन पर बैठे, वैदिक मंत्रों का पाठ शुरू हुआ. बालक नानक देव ने पंडित जी से उपनयन संस्कार के महत्व और प्रयोजन के बारे में पूछा.

तब पुरोहित नें कहा, तुम्हारा यज्ञोपवीत संस्कार हो रहा है, हिन्दू धर्म के अनुसार “पवित्र धागे” को धारण करना कल्याणकारी होता है. इससे तुम्हे हिंदू धर्म में दीक्षित कराया जा रहा है.

कौतुहल वश नानक बोले,:- “यह तो सूत का धागा है, गंदा हो जायेगा ना? और टूट भी सकता है? इस प्रश्न के जवाब में पुरोहित जी ने समझाया की, मैला होने पर इसे साफ़ कर सकते हैं. और खंडित हो जाने पर इसे बदला भी जा सकता है.”

अब नानक बोले, “देहांत के बाद, यह शरीर के साथ जल भी जाता होगा ना? यदि इसे धारण कर लेने से शरीर, आत्मा, मन तथा यज्ञोपवीत में अखंड पवित्रता नहीं रहती तो इसे धारण करने से क्या लाभ?

नानक नें कहा :-“अगर यज्ञोपवीत धारण कराना है तो, अखंडित और अविनाशी यज्ञोपवीत पहनाओ जिस में दया का कपास हो और संतोष का सूत हो. ऐसा यज्ञोपवीत ही सच्चा यज्ञोपवीत है”.

हे आदरणीय पुरोहित जी, क्या आप के पास ऐसा सच्चा यज्ञोपवीत है? बालक नानक के इस सटीक तर्क की काट वहां मौजूद किसी व्यक्ति के पास न थी.और विधि-पाठ यही समाप्त हो गया.

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गुरु नानक की मक्का यात्रा:

“एक बार गुरु नानक के मुसलमान चेले मरदाना ने कहा कि वह मक्का मदीना जाना चाहता है. उसका यह मानना था की एक मुसलमान जब तक मक्का नहीं जाता है तब तक सच्चा मुसलमान नहीं कहलाता है. कुछ ही दिनों में गुरु नानक, मरदाना और बाला तीनों मक्का की यात्रा पर निकले. वहां पहुँच जाने पर गुरु नानक काफ़ी थक गए. वह मुसाफिरों के लिए बनी आरामगाह पर जा कर आराम करने लगे.

गुरु नानक को देख कर उस जगह काम करने वाला एक व्यक्ति आग बबूला हो गया. उसने गुरु नानक से गुस्से में कहा- “आपको इतनी समझ नहीं कि खुदा  की ओर पाँव रख कर नहीं सोते?

तब गुरु नानक बोले-

मुझे विश्राम करने दो भाई, मैं बहुत थका हुआ हूँ. या फ़िर तुम खुद ही मेरे पाँव उस दिशा में कर दो जिधर खुदा न हों!

वाहे गुरु के शब्दों तर्क

तब खादिम को एहसास हुआ कि खुदा तो हर तरफ है और उसने गुरु नानक देव से माफ़ी मांग ली.

गुरु नानक नें भी उसे माफ़ कर दिया और मुस्कुराते हुए कहा- “खुदा दिशाओं में वास नहीं करते, वह तो दिलों में राज करते हैं. अच्छे कर्म करो, खुदा को दिल में रखो, यही खुदा का सच्चा सदका है.”

आज फिर जरूरत है कई नानक देव की

ईसा पूर्व छठी सदी से 20 वीं सदी तक हिंदू धर्म को ठुकराकर कई महान सुधारक हुए हैं.जिनमें तथागत बुद्ध,महावीर स्वामी,गुरु नानक देव जी,सन्त कबीर,रैदास और बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर प्रमुख हैं इन समाज सुधारकों ने हिंदुत्व में समता लाने,जातिभेद समाप्त करने,अंधविश्वास को नकारने,नर तथा नारी में विभेद खत्म करने की मुहिम चलाई .मगर हिंदू धर्म ने अपनी वैदिक और मनुवादी सोच को बरकरार रखा. जिसके कारण आज भी भारत में विषमताओं की लंबी कतार है.जिसके सुधार के लिए अब न नानक ,न कबीर ,न बुद्ध ,न महावीर और न हीं अम्बेडकर पुनः आएंगे.अगर भारत को भारत की पहचान दिलानी है तो ,भारत के संविधान को बचाना होगा.

सोच बदलो।समाज जगाओ ।संविधान बचाओ।


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