भारत ही नहीं बल्कि दुनियाँ के कई दार्शनिकों और संतों ने जीवन के सत्य को खोजने और जानने की कोशिशें की हैं.वैसे तो विज्ञान ने प्रकृति के लगभग हर रहस्य को खोज लिया है,जिन ग्रहों को भारत में इंसान की तकदीर और किस्मत,तथा राशियों से जोड़ा जाता था,उन ग्रहों तक इंसान ने सफर कर लिया है.स्टीफन हाकिन्स ने गॉड पार्टिकल (God Particle) तक को खोज दिया था.जिससे जीवन के सारे रहस्यों से पर्दा उठ जाता.लेकिन उनकी मृत्यु हो जाने से इस मिशन को अंतिम परिणाम तक पहुंचने में कुछ और वक्त लग सकता है.

आध्यत्मिक दर्शन में जीवन के सत्य की खोज

इंसान ने अपनी उतपत्ति से लेकर निरंतर नए-नये आविष्कार और खोजें की हैं.मानव गुफाओं और कन्दराओं से निकलकर आज चांद और मंगल तक पहुंच गया है.विज्ञान की प्यास अभी बुझी नहीं है.लेकिन तमाम भौतिक रहस्यों से पर्दा हटने के बाद भी मानव जीवन एक अबूझ पहेली बनी हुई है.जीवन क्या है?इंसान मरता क्यों है?मरने के बाद आत्मा कहां चली जाती है?अनेक ऐसे सवाल हैं जिनके उत्तर ढूंढने के लिए भगवान बुद्ध से लेकर ओशो ने गहन खोज की है.दुनियाँ बहुरंगी जरूर है,मगर जीवन की हकीकत एक virtual image के सिवा कुछ नहीं है.

जीवन के सत्य :Jeewan ke Satya

तथागत बुद्ध और लार्ड कृष्णा:(Tathagata Buddha and Lord Krishna)

जिस राज-पाट को पाने के लिए लोग खून की होलियां खेल देते हैं,लेकिन भगवान बुद्ध ने उस वैभव पूर्ण राजमहल को त्याग दिया,आखिर क्यों?इसका उत्तर भी इसी आर्टिकल में मिलेगा ,लेकिन एक झलक महाभारत के युद्ध पर डालना भी जरूरी है.’बात जीवन के सत्य को जानने और जीवन के रहस्य को समझने की है.महाभारत की लड़ाई राज-पाट को हांसिल करने के लिए ही लड़ी गयी थी,मगर अंत क्या हुवा?खून ही खून बहा ,न जीतने वाले जीत का कुछ हर्ष मना पाए न हारने वालों ने कुछ खोया.

READ ALSO:-https://sochbadlonow.com/chanakya-niti-ki-baten-kya-hain/

https://sochbadlonow.com/guru-nanak-dev-ji-aur-janey-sanskar/

तथागत बुद्ध और श्री कृष्ण में यही अंतर है कि-श्री कृष्ण महाभारत के रण को नहीं रोक सके,लेकिन लार्ड बुद्धा ने अंगुलिमाल को बदल डाला,जो अन्ततः उनका शिष्य बन गया.इसी सोच को बदलने के लिए भगवान बुद्ध ने राजमहल त्यागकर सत्य की खोज में निकल पड़े.

बुद्ध की कठिन साधना(Difficult cultivation of Buddha)

भगवान बुद्ध ने कठिन साधना की.बोधगया में उनको बुद्धत्व की प्राप्ति हुई.वे एक ऐसे प्रकाश की खोज में थे जिससे जीवन के सारे अज्ञानता रूपी अंधेरे मिट जाएं.छः वर्षों की कठोर साधना से उनका शरीर हाड़ -मांस का सिर्फ ढांचा ही रह गया था.वे अत्यंत दुर्बल हो गए थे.उन्होंने इस मार्ग को भी उचित नहीं समझा कि शरीर को अत्यंत कष्ट दिया जाए.उन्होंने जीवन के इस सत्य को भी जान लिया था कि-शरीर तो केवल आदेश मानने वाला है.वास्तव में मन ही शरीर को इधर-उधर भटकाता फिरता है.अच्छे और बुरे का ज्ञान भी यही मन देता है.

संसार की दो अतियां:(Two extremes of the world)

तथागत बुद्ध ने कहा कि इस संसार में 2 प्रकार की अतियां हैं.इन दो अतियों से मुक्त होकर ही जीवन के सत्य के करीब पहुंचा जा सकता है.

  1. मनुष्य का भोग-विलास और काम -सुख में आजीवन दूबे रहना.
  2. शरीर को तरह-तरह के कष्ट देकर कठोर-से -कठोर तपस्वतपस्वी जीवन बिताना.

ये दोनों अतियाँ मनुष्य के लिए हानिकारक हैं,क्योंकि अति भोग विलास की इच्छाएं मनुष्य को अपना गुलाम बना देती हैं,और जीवन का सर्वनास कर देती हैं.मनुष्य को सुखी जीवन बिताने के लिए ‘मध्यम मार्ग’का अनुसरण करना चाहिए.

तृष्णा क्या है?

बुद्ध ने दुख के जो मुख्य कारण बताया है वह है मनुष्य में तृष्णा का होना.ये तृष्णा कैसे पैदा होती है?जिन चीजों में मनुष्य जीवन का आनंद ढूंढता है ,वह आनन्द क्षणिक है .

रूप, रंग,गन्ध,स्पर्ष संज्ञा,प्यार,माया ये प्रिय तो लगते हैं,लेकिन वास्तव नें ये जीवन के स्थायी सत्य नहीं है इन्हीं से तृष्णा पैदा होती है.सौंदर्य-विचार,शब्द विचार,गन्ध-विचार ,रस-विचार,स्पर्श-विचार,काम-विचार, मन के विशयों का विचार ये सभी प्रियकर तो हैं,लेकिन इन्हीं में तृष्णा अपना घर बना लेती है.और मनुष्य जीवन के सत्य से भटक जाता है.

“आंख, कान, नाक,जिह्वा, काय और मन के द्वारा मनुष्य क्रमशः रूप, गन्ध,रस,स्पर्श तथा मन के विषयों का अनुभव करता है,प्रियकर लगने पर उनमें आशक्त हो जाता है तथा अप्रियकर लगने पर उनसे दूर भाग जाता है.जीवन के सत्य को समझाते हुए तथागत बुद्ध कहते हैैं:- जहां भव है, वहां जन्म हैै. जहां जन्म है, वहां बूढ़ा होना, मरना, शोक करना, चिंतित होना, ,पीडित होना, रोना -पीटना, सब ही हैं. इस प्रकार समस्त दुख का समुदाय (उतपन्न) होता है .

जानें क्या हैं 4 Big आर्य सत्य:(Four Big ary satya):

लार्ड बुद्धा ने जीवन को कष्टों और दुःखों से मुक्त करने के लिए चार आर्य बताए हैं.

दुःख आर्य सत्य:(Dukh arya satya):

बुद्ध ने अपने शिष्यों को संबोधित करते हुए कहा -“भिक्खुओं!दो बातें ध्यान देने वाली हैं और अहम हैं-पहली बात दुख और दूसरी बात दुख से मुक्ति “.आगे बुद्ध कहते हैं’क्या होना दुख है?’और इसके उत्तर को बताते हुए कहते हैं-“जन्म होना दुख है,शोक करना दुख है,रोना-पीटना दुख है,पीड़ित होना दुख है,हैरान-परेशान होना दुख है,इच्छा की पूर्ति न होना दुख है .

दुख समुदाय आर्य सत्य:(dukh samuday arya satya)

तथागत बुद्ध कहते हैं कि जीवन में दुख है,फिर वे प्रश्न उठाते हैं कि “क्या होने से दुख होता है?”या दुख का कारण क्या है?.दुख का कारण बताते हुए बुद्ध कहते हैं,”बार-बार जो जन्म का कारण है ,यह जो लोभ और राग से युक्त है,भौतिक सुख का जो क्षणिक आनन्द है ,तृष्णाएं हैं-जैसे काम- तृष्णा,भव तृष्णा तथा विभव तृष्णा-ये ही जीवन में दुख के कारण हैं”.

दुख निरोध आर्य सत्य:-

बुद्ध कहते हैं,” संसार में दुख है. दुख का कारण है. अतः प्रश्न उठता है क्या दुख से मुक्ति संभव है? क्या दुख से मुक्ति मिल सकती है?तृष्णा से संपूर्ण वैराग्य, उसका निरोध, तृष्णा की समाप्ति से ही दुख का निरोध संभव है. रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार तथा विज्ञान का निरोध, उपशमन और अस्त होना ही दुख का निरोध है, रोगों का उपशमन है और जरा- मरण का अंत होना है. यही दुख निरोध आर्य सत्य है.”और जीवन के सत्य को जानने का एक सरल मार्ग है.

दुख निरोधगामी मार्ग आर्य-सत्य:-

क्या वास्तविक जीवन के सत्य “भोग -विलास और ‘खाओ पियो मौज करो’ में है? कुछ लोग सामाजिक जीवन सेे पूर्ण विमुख होकर जंगल, पहाड़ों मैं जाकर शरीर को अधिकतम कष्ट्ट देने या कठिन तपस्या करने को ही दुख निरोध का मार्ग समझ बैठते हैैं.

लेकिन भगवान बुद्ध ने जीवन में सुख के मार्ग के लिए अतियों से बचकर मध्यम मार्ग पर पर चलने का उपदेश दिया है.यह मार्ग आष्टांगिक मार्ग कहलाता है,जो जीवन को दुखों से दूर ले जाने वाला गए.बुद्ध कहते हैं कि दुख का विनाश करने के लिए तथा निर्वाण पाने के लिए मानव के पास मात्र एक यही मार्ग है.जानते हैं ये अष्टांगी मार्ग(eight fold theory) क्या-क्या हैं.

अष्टांगिक मार्ग क्या हैं? What are eight fold path Theory of Lord Budhha)

Lord बुद्धा अष्टांगिक मार्ग

भगवान बुद्ध ने जीवन के सत्य को पाने और जानने के लिए आठ मार्ग बतलाये हैं,जिनको आर्य अष्टांगिक मार्ग कहते हैं.जो निम्नवत हैैं.

सम्यक दृष्टि(Right Vision):

सम्यक दृष्टि का आशय है,-प्रकृति में जो वस्तु जैसी है,उसको वैसा ही समझना अर्थात 4 आर्य सत्यों का दर्शन करना और समझना. सभी संस्कार अनित्य हैं,सभी संस्कार दुख हैं,सभी धर्म अनात्म हैं’का बोध होना ही सम्यक दृष्टि है.सभी प्रकार की मिथ्या धारणाओं से विलग रहना सम्यक दृष्टि है.

सम्यक संकल्प(Right Resolve):

राग,हिंसा और प्रतिहिंसा-रहित संकल्प रखना ही सम्यक संकल्प है.मनुष्य जीवन के सत्य को पाना है तो ,अपनी आशाएं,आकांक्षाएं, महत्वाकांक्षयाएँ ऊंचे स्तर (कल्याणकारी) होनी चाहिए.हमारे चिंतन-मनन ,संकल्प-विकल्प का सम्यक(right)होना ही ‘समा संकल्पो’है.

सम्यक वाणी या सम्मा वाचा (Right Speech)

वाणी की शुद्धता, निर्मलता और पवित्रता ही सम्यक वाणी है.इसके अंतर्गत निम्म बातें आती हैं.

  1. सत्य बोलना
  2. दूसरों की बुराई न करना
  3. चुगली -चपाटचपाटी न करना
  4. किसी के प्रति अभद्र भाषा या गाली -गलौज या कठोर वचन न बोलना.
  5. झूठी गवाही न देना.सदा विनम्र-वाणी बोलना.
  6. दूसरों के प्रति झूठी बातें या अफवाह न फैलाना.
  7. धम्मानुकूल बातें ही करना.
  8. बुद्धिसंगत, सार्थक तथा उद्देश्यपूर्ण वाणी को व्यवहार में लाना,मूर्खतापूर्ण बातों से बचना, चुगली न करना,झगड़ा न करना .ये सम्यक वाणी के रूप हैं.

सम्यक कर्मान्त(Right conduct):

सम्यक कर्मान्त हमको ऐसी शिक्षा देता है कि-दूसरे व्यक्ति की भावनाओं और अधिकारों को क्षति नहीं पहुंचानी चाहिए.जीव हिंसा,चोरी और मिथ्यारहित कर्म करना ही सम्यक कर्मान्त है.कर्म का आरंभ मन से होता है,फिर वाणी और फिर आगे बढ़कर अंत में शरीर पर उतरता है.इसलिए इसे कर्मान्त कहा गया है.

सम्यक आजीविका(Right livelihood)

सही आजीविका क्या होनी चाहिए,जिसके द्वारा मनुष्य जीवन के सत्य के करीब पहुँच पाए?इस बारे भगवान बुद्ध कहते हैं-

“आजीविका ऐसी होनी चाहिए ,जिससे किसी अन्य की हानि न हो और न ही किसी के प्रति अन्याय हो .लोक-कल्याण की दृष्टि से सामान्यतः हमें हथियार का व्यापार, प्राणी का व्यापार, मांस का व्यापार, शराब का व्यापार आदि नशीली वस्तुओं का व्यापार तथा जहर का व्यापार नहीं करना चाहिए.

सम्यक व्यायाम (Right Effort):

व्यायाम का अर्थ ‘प्रयास ‘से है.शारीरिक कसरत नहीं.स्मतक व्यायाम का उद्देश्य है,इंद्रियों पर संयम रखना, बुरी भावनाओं को रोकना, अच्छी भावनाओं को पैदा करने का प्रयत्न करना तथा उतपन्न हुई अच्छी भावनाओं को कायम रखना

सम्यक स्मृति (Right mindfulness):

मन की सतत जागरूकता ही सम्यक स्मृति है.मन में उत्तपन्न होने वाले कुविचारों के प्रति हमेशा सचेत रहकर अपने मन को सुविचारों में लगाना सम्यक स्मृति है.काया, वेदना,चित और मन की उचित स्थितियों का ज्ञान ,उसके मलिन होने और क्षण-भंगुर होने का ज्ञान रखना,जीवन के सत्य को जानना है,यही वास्तविक सम्यक स्मृति है.

सम्यक समाधि Right Samadhi:

लार्ड बुद्धा ने जीवन में ध्यान ( meditation) के महत्व पर विशेष जोर दिया है.वे कहते हैं ध्यान से ही ज्ञान की प्राप्ति संभव है.ध्यान से ही समाधि की ओर जाया जा सकता है :-

समाधि एक भावात्मक वस्तु है यह मन के कुशल कर्मों को एकाग्रता के साथ करने का अभ्यास कराती है. यह मन में उत्पन्न बुरे कर्मों की ओर आकर्षित होने की प्रवृत्ति को ही समाप्त कर देती है. समाधि और सम्यक समाधि दोनों में बहुत अंतर है. समाधि का अर्थ है केवल चित्त की एकाग्रता, जबकि सम्यक समाधि का अर्थ है चित में स्थाई परिवर्तन के लिए ,पल-पल की सच्चाई के प्रति जागरूक अवस्था.

लोभ ,द्वेष, आलस्य,शंसय तथा अनिश्चय आदि बाधाओं के बंधनों को सम्यक समाधि के द्वारा ही जड़ से समाप्त किया जा सकता है . सम्यक समाधि मन को कुशल और हमेशा कुशल कुशल सोचने की आदत डालती है. व्यक्ति कल्याणरत रहता है .इससे वह शक्ति मिलती है जिससे व्यक्ति जीवन के सत्य को करीब से जान सकता है.और मुक्ति के मार्ग को खोज सकता है.


सोच बदलो।समाज जगाओ

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here