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पूना पैक्ट की सच्चाई [1932]और क्या था गांधी का दलितप्रेम?A big cheat.

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पूना पैक्ट की सच्चाई हर भारतीय दलित वर्ग के लोगों को जाननी चाहिए.डॉ0 आंबेडकर के अथक संघर्ष के बाद द्वितीय गोलमेज सम्मेलन(second round table confrence) में वे ब्रिटिश हुकूमत से अछूतों के लिए कुछ विशेष अधिकार पास करवाने में सफल हुए.जिसको ‘कम्यूनल अवार्ड’ कहा जस्ता है.16 अगस्त 1932 को रैमजे मैकडोनाल्ड ने इस पर हस्ताक्षर कर दिए.इसको Macdonald Award भी कहा जाता है.

रैमजे मैकडोनाल्ड जिन्होंने कम्युनल अवार्ड दिया,
रैमजे मैकडोनाल्ड

कम्युनल अवार्ड की सिफारिशें:

1-प्रांतीय व्यवस्थापिका सभाओं की सदस्य संख्या बढ़ाकर दोगुनी कर दी गई गयी.

2- अल्पसंख्यक के लिए अलग निर्वाचन की व्यवस्था की गई।

3-दलितों को हिंदुओं से अलग मानकर उनके लिए भी पृथक निर्वाचन तथा प्रतिनिधित्व का अधिकार दिया गया.

4-स्त्रियों के लिए भी कुछ स्थान आरक्षित किए गएविशेष निर्वाचन क्षेत्रों में दलित जाति के मतदाताओं के लिये दोहरी व्यवस्था की गयी। उन्हें सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों तथा विशेष निर्वाचन क्षेत्रों दोनों जगह मतदान का अधिकार दिया गया.

5-सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में दलित जातियों के निर्वाचन का अधिकार बना रहा.

6-दलित जातियों के लिये विशेष निर्वाचन की यह व्यवस्था बीस वर्षों के लिये की गयी.

7-दलितों को अल्पसंख्यक के रूप में मान्यता दी गयी.

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन लंदन.जिसके बाद कम्युनल अवार्ड पारित हुवा. पूना पैक्ट की सच्चाई और गांधी का दलित प्रेम गोलमेज सम्मेलन से खुल गया.
second round table confrence

ये भी पढ़े—पुना पैक्ट के बाद बिहार में दलित प्रेम.

अछूतों के लिए 24 सितंबर का दिन बेहद कड़ुवी यादें दिलाता है.दोस्तो ये बात साफ तौर पर नई पीढ़ी को याद रख लेनी चाहिए कि हिंदुस्तान में दलितों के लिए न कोई दिन शुभ है,न कोई महीना शुभ है,न कोई साल शुभ है.सालों /वर्षों की क्या बात करें यहां तो सदियां भी अछूतों के लिए बहुत ही कष्टकारी और अमानवीय रहे है.फिर भी अछूत /दलितों ने कोई ऐसा कदम नहीं उठाया जिसके कारण हिन्दू धर्म और समाज की पोल दुनियाँ के सामने खुल जाए.अपमान और शोषण ,अस्पृश्यता का जहर पीकर भी वे भारत माता के वफादार रहे है,इतिहास गवाह है.

24 september 1932 पूना पैक्ट की सच्चाई और गांधी का दलित प्रेम:

24 september 1932 को जो समझौता डॉ0 आंबेडकर और महात्मा गांधी के मध्य हुवा ,उंसके पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए और पूना पैक्ट की सच्चाई को समझने के लिए कुछ अहम बिदुओं पर गहनता से विचार करना होगा.जिसके लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने प्राणों की बाजी लगा दी.

पूना पैक्ट के बाद कि तस्वीर।
पूना पैक्ट के बाद की तस्वीर

1-डॉ0 बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर का भारतीय राजनीति में प्रवेश,और देश में एक मात्र अछूत नेता के रूप में उभरना.तथा ब्रिटिश शासन द्वारा गोलमेज कांफ्रेंस में भारत के दलित वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में डॉ0 अम्बेडकर को आमंत्रित करना.

2-वर्णव्यवस्था पर गांधी जी और डॉ0 अम्बेडकर के बीच मतभेद बहुत गहरे थे.गांधी जी वर्णव्यवस्था को हिन्दुत्व की संस्कृति का अहम अंग मानते थे ,और अम्बेडकर हिन्दू धर्म में व्याप्त जाति प्रथा के बीज को खत्म करना चाहते थे.

3-महात्मा गांधी को ये अपमान महसूस होने लगा कि-उनके कई बार सर सैमुअल होर जो भारत मंत्री (secretory state) थे ,को पत्र लिखा था ,साथ ही ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमजे मैकडोनाल्ड को भी पत्र लिखे थे – कि वो सांप्रदायिक पंचाट(communal award) स्वीकार नहीं करंगे.आप communal award को वापस ले लें.

4-गांधीजी और हिंदू राष्ट्रवादियों को डॉ0अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति जलाए जाने का बदला लेने का ये उचित अवसर दिखाई दिया जब “सांप्रदायिक पंचाट”को वापस लेने के लिए डॉ0 अम्बेडकर को मजबूर किया जाए.

देखें पूना पैक्ट की सच्चाई और गांधी जी का दलित प्रेम जो उनके द्वारा रैमजे मैकडोनाल्ड को लिखा गया पत्र से स्पष्ट हो जाता है.

गांधी जी द्वारा रैमजे मैकडोनाल्ड को

लिखा पत्र:

प्रिय मित्र,

इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि सर सैमुअल होर (जो भारत मंत्री थे) ने आपको और मंत्रिमंडल को मेरा वह पत्र दिखा दिया है जो मैंने दलित वर्गों के सवाल पर 11 मार्च को लिखा था .उस पत्र को इस पत्र का हिस्सा माना जाए ,और इस पत्र के साथ पढ़ा जाए.

मैंने अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व पर अंग्रेजी हुकूमत का निर्णय पड़ा है और उस पर चुप लगा गया हूं .सेंट जेम्स पैलेस में 3 नवंबर 1931 को संपन्न गोलमेज सम्मेलन की अल्पसंख्यक समिति की बैठक में अपनी घोषणा के अनुसार मुझे आपके निर्णय का जी जान से विरोध करना है.इसका एक मात्र तरीका यही हो सकता है कि आमरण अनशन की घोषणा करूं जिसमें मैं नमक और सोडा युक्त अथवा उससे रहित जल के सिवाय किसी किस्म का कोई भोजन ग्रहण नहीं करुंगा. यह अनशन टूट जाएगा अगर इसके दौरान अंगेजी हुकूमत अपने ही प्रस्ताव से अथवा जनमत के दबाव में अपने निर्णय पर पुनर्विचार करती है .और दलित वर्गों के लिए सांप्रदायिक निर्वाचन मंडलों की अपनी योजना को वापस ले लेती है,जिनके प्रतिनिधियों का चुनाव आम निर्वाचक मंडल द्वारा सामान्य मताधिकार केअन्तर्गत होना चाहिए, चाहे वह कितना भी व्यापक हो .

प्रस्तावित अनशन सामान्य स्थिति में आगामी 20 सितंबर की दोपहर से शुरू हो जाएगा यदि कथित निर्णय पर ऊपर सुझाए ढंग से इस बीच पुनर्विचार नहीं होता.

आगे देखिए गांधी जी किस कड़क अंदाज में चेतावनी दे रहे हैं देखिये पत्र का अगला

मैं यहां के अधिकारियों से कह रहा हूं कि वे इस पत्र के पाठ को आप को तार द्वारा भेज दें जिससे आपको पर्याप्त नोटिस मिल जाए. किंतु हर हाल में ,मैं इतना पर्याप्त समय छोड़ रहा हूं कि यह पत्र सबसे धीमी रासे से भी आप तक समय से पहुंच जाए.

मैं यह भी कहता हूं कि सर सैमुअल होर को प्रेषित पत्र का उल्लेख किया जा चुका है ,उसे यथा शीघ्र प्रकाशित कर दिया जाए .जहां तक मेरी बात है ,तो मैंने जेल के नियम का पूर्ण सावधानी से पालन किया है और अपनी इच्छा अथवा पत्रों की विषय सामग्री के बारे में अपने दो साथियों ,सरदार वल्लभभाई पटेल और मिस्टर महादेव देसाई के सिवा और किसी को भी नहीं बताया है .किंतु ,यदि आप इसे संभव करें तो ,मैं चाहता हूं कि जनमत मेरी पत्रों से प्रभावित हो. जिसे मैं उन्हें शीघ्र प्रकाशित करने का अनुरोध करता हूं.

क्या कम्युनल अवार्ड वास्तव में हिन्दू धर्म के लिए विघटन कारी था?जानें पूना पैक्ट की सच्चाई।

जैसा कि अभीतक हमने देखा है अकेले गांधी जी ‘किस अंदाज में “मैकडोनाल्ड अवार्ड”या कम्युनल अवार्ड के विरोध में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमजे मैकडोनाल्ड को पत्र लिख रहे हैं.गांधी जी को उस अवार्ड के अन्य कोई बिंदुओं पर बहुत ज्यादा आपत्ति नहीं थी.बजाए अछूतों को मिलने वाले अधिकारों के विषय में जितनी आपत्ति थी.ऐसा प्रतीत होता है पूना पैक्ट और गांधी का दलित प्रेम एक छलावा था.गांधी जी चाहते तो देश से जातिवाद मिट सकता था.फिर किसी पैक्ट या आरक्षण की जरूरत ही नहीं होती.पूना पैक्ट की सच्चाई यही बयां करती है.

कम्युनल अवार्ड को खत्म करना गांघीजी ने धर्म और अपने सम्मान से जोड़ लिया था देखें पत्र का अगला भाग

“मैंने जो निर्णय किया है ,उस पर मुझे खेद है .किंतु एक धार्मिक व्यक्ति होने के नाते ,जो में स्वयं को समझता हूं,मेरे लिए कोई और रास्ता खुला नहीं बचा है.जैसा कि मैंने सर सैमुअल होर को संबोधित अपने पत्र में कहा है,यदि अंग्रेजी हुकूमत ने अपने आपको उलझन से बचाने के लिए मुझे रिहा करने का फैसला किया भी,तो भी मेरा अनशन जारी रहेगा.क्योकि,अब मैं किसीऔर तरीके से इस निर्णय के विरोध की आशा नहीं करता हूँ, और मैं केवल सम्मानजनक तरीके से ही अपनी रिहाई चाहता हूं.

गाँधी जी ने सायद इतनी हठधर्मिता सायद ही पहले कभी दिखाई हो.पूना पैक्ट की सच्चाई को समझने के लिए ये महत्वपूर्ण पत्राचार आगे जारी है.पढ़ते रहिए पत्र का अंतिम भाग.

पूना पैक्ट की सच्चाई और गांधीजी की जिद

गांधीजी क्या वास्तव में पश्चाताप कर रहे थे?

हो सकता है मेरा निर्णय विकृत है और मैं दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन मंडलों को उनके लिए अथवा हिन्दू धर्म के लिए हानिकारक समझने में पूर्ण रूप से गलती पर हूं. यदि ऐसा है ,तो यह संभव है मैं अपने जीवन दर्शन के अन्य हिस्सों के संदर्भ में यही सही हूं. उस स्थिति में अनशन से मेरी मृत्यु मेरी गलती का पश्चाताप होगी और उससे उन असंख्य पुरुषो और महिलाओं पर से बोझ हट जाएगा जो मेरी बुद्धिमता में बच्चों जैसी आस्था रखते हैं.जबकि यदि मेरा निर्णय सही है,जो मेरी दृष्टि में निस्संदेह है,तो यह विचारित कदम केवल उस जीवन योजना की पूर्ति के कारण है जिसे मैंने एक चौथाई शताब्दी से भी अधिक समय तक आजमाया है,और मुझे उसमें पर्याप्त सफलता भी प्राप्त हुई है.

मैं हूँ सदा,
आपका निष्ठावान मित्र
एम.के. गांधी

पूना पैक्ट का सच

रैमजे मैकडोनाल्ड का गांधी जी के पत्र का उत्तर

“80 डाउनिंग स्ट्रीट,
सितम्बर 8, 1932

प्रिय मि.गांधी,

आपका पत्र पाकर मुझे अत्यंत आश्चर्य और, मैं आगे कहूं तो अत्यंत शुद्ध खेद हुआ है. बहरहाल, मैं यह सोचे बिना नहीं रह सकता कि आपने इसे इस संबंध में गलतफहमी के चलते लिखा है कि दलित वर्गों के संबंध में अंग्रेजी हुकूमत के निर्णय का सही निहितार्थ क्या है ,हमने हमेशा यही समझा है कि आप हिंदू धर्म से दलित वर्गों के स्थाई अलगाव के खिलाफ हैं ,आपने अपने रुख को गोलमेज सम्मेलन की अल्पसंख्यक समिति पर बिल्कुल स्पष्ट कर दिया था और सर सैमुअल होर को प्रेषित अपने 11 मार्च के पत्र में इसे फिर से व्यक्त कर दिया. हम यह भी जानते थे कि आपके विचार से विशाल हिंदू मत भी सहमत है ,और इसलिए हमने दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व के सवाल पर विचार करते समय इस बात पर अत्यंत सावधानी पूर्वक गौर किया था.

जहां हमने दलित वर्गों के संगठनों से प्राप्त अनेक अपीलों को और उन आम स्वीकृत सामाजिक अयोग्यताओं पर ध्यान देते हुए, जिनके तले वे जूझते हैं और जिसे आपने अक्सर माना है, इसे अपना कर्तव्य समझा है कि उसकी रक्षा करें जिसे हम विधायिका में उचित अनुपात में प्रतिनिधित्व का दलित वर्गों का अधिकार मांगते हैं, वही हम इस ओर भी उतने ही सावधान थे हम ऐसा कुछ ना करें जिससे उनका समुदाय हिंदू जगह से टूट जाए .आपने अपने 11 मार्च के पत्र में स्वयं लिखा कि आप विधायिका में उनके प्रतिनिधित्व का विरोध नहीं करते. ……….

आप जिसे दलित वर्गों के लिए एक सांप्रदायिक निर्वाचन मंडल कहते हैं ,हमने उसे बनाने के विरुद्ध जानबूझकर निर्णय किया है और दलित वर्ग के सभी मतदाताओं के सामान्य अथवा हिंदू निर्वाचन क्षेत्रों में शामिल किया है .जिससे कि ऊंची जातियों के प्रत्याशियों को दलित वर्गों से अथवा दलित वर्गों के प्रत्याशियों को ऊंची जातियों से चुनाव में वोट मांगने पड़े. इस प्रकार,हर तरह से हिंदू समाज की एकता को संरक्षित रखा गया ……………

पत्र काफी लंबा है जिसमें मैकडोनाल्ड ने गांधी जी को काफी समझाने और भरोसा दिलाने की भरपूर कोशिश की लेकिन गांधी जी अड़े रहे .पूना पैक्ट की सच्चाई को समझने के लिए पत्र का अंतिम भाग और गांधी जी की अंतिम चेतावनी का जिक्र करना जरूरी है.

मैकडोनाल्ड आगे लिखते हैं—

आपने कहा कि इस पत्राचार को ,सर सैमुअल होर को संबोधित आपके 11 मार्च के पत्र सहित,प्रकाशित किया जाए .क्योंकि यह मुझे अनुचित प्रतीत होता है यदि अपनी वर्तमान नजरबंदी के कारण आप जनता को यह स्पष्ट करने और यह तर्क देने के अवसर से वंचित रह गए कि आप अनशन क्यों करना चाहते हैं,इसलिए मैं तत्परता से इस अनुरोध को स्वीकार करूंगा कि आप हुकूमत के निर्णय के वास्तविक ब्योरे पर विचार करें और स्वयं से गंभीरतापूर्वक यह सवाल करें कि क्या आप जो करने की सोच रहे हैं वह वास्तव में आपके लिए औचित्यपूर्ण है.

मैं हूँ,

आपका अत्यंत भवनिष्ठ

जे.रैमजे मैक डोनल्ड”

पूना पैक्ट की सच्चाई

मैक डोनल्ड को गांधी जी का उत्तर और अनशन की पूर्ण तैयारी।

जब गांधीजी ने देखा कि प्रधानमंत्री नहीं झुक रहे हैं ,तो उन्होंने उन्हें निम्नलिखित पत्र भेजा जिसमें उन्होंने यह सूचित किया कि वह अपनी आमरण अनशन की सोच पर अडिग थे-

” यरवदा केंद्रीय कारावास
सितंबर 9,1932

प्रिय मित्र,

में आपको धन्यवाद देना चाहूंगा आपके सपष्ट और विस्तृत पत्र के लिए जो तार द्वारा आज ही मुझे प्राप्त हुआ.किंतु मुझे इस बात का दुख है कि आपने विचारित कदम की वह व्याख्या की है जो मेरे दिमाग में कभी आयी ही नहीं. मैंने तो उसी वर्ग की तरफ से बोलने का दावा किया है ,जिनके बारे में आपने मेरे ऊपर लांछन लगाया है कि उनके हितों की तिलांजलि देने के लिए में आमरण अनशन करना चाहता हूं.—–बिना कोई बहस किये ,मैं यह स्वीकार करता हूं कि मेरे लिए यह विशुद्ध धर्म का मामला है .मात्र दलित वर्गों के पास दोहरे वोट होने से ही उनका अथवा हिन्दू समाज का विघटन से बचाव नहीं हो जाता.दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की स्थापना में मुझे जहरीले इंजेक्शन का बोध होता है.जिसे सोच-समझकर हिंदू धर्म को नष्ट करने के लिए दिया जा रहा है और जिससे दलित वर्गों का कोई भला नहीं होना.आपकी अनुमति से मैं यह कहना चाहुुंगा कि आप चाहे जितने भी हम दर्द हूं आप संबंधित पक्षों केेेे लिए इतने अधिक और धार्मिक महत्वव के मामले पर सही निर्णय पर नहीं पहुंच सकते .

मैं तो दलित वर्गों के सामान्य से अधिक प्रतिनिधित्व के विरुद्ध भी नहीं होना चाहूंगा .मेरा विरोध तो सीमित रूप में भी हिंदू धर्म से उनके वैधानिक अलगाव को लेकर है, जब तक भी इसकी सदस्य बने रहना चाहते हैं. क्या आप ने यह महसूस किया है कि यदि आपका निर्णय बरकरार रहता है और संविधान अस्तित्व में आ जाता है, तो आप के कारण उन हिंदू सुधारकों के काम की अद्भुत प्रगति बाधित हो जाएगी ,जिन्होंने स्वयं को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपने दबे-पिसे बंधुओं के उत्थान के प्रति समर्पित कर दिया है?

—- मेरी राय में अन्य अनेक हिस्सों पर भी भारी आपत्ति की संभावना है. बस मैं उन्हें इस योग्य नहीं समझता कि उनके कारण आत्मोत्सर्ग (स्व-बलिदान) करूं, जैसे कि दलित वर्गों के मामले में मेरे विवेक ने मुझे प्रेरित किया है.

मैं हूं सदा ,

आपका निष्ठावान मित्र,

एम.के. गांधी”

अन्ततः वही हुवा जिस बात के लिए गांधीजी अड़े थे ,कि अछूतों के लिए पृथक निर्वाचन मंडली को प्रधानमंत्री खारिज कर दें.रैमजे मैकडोनाल्ड ने गांधी जी की मांग को खारिज कर दिया .और परिणाम स्वरूप 20 सितंबर 1932 को गांधीजी ने “आमरण अनशन” शुरू कर दिया.और डॉ0 अम्बेडकर अछूतों के लिए किए गए संघर्ष की राजनीतिक हत्या कर दी.पूना पैक्ट की सच्चाई को समझने के लिए उपरोक्त पत्रों का विश्लेषण करना जरूरी है.

पूना पैक्ट का मूल्यांकन

पूना पैक्ट (POONA PACT) भारतीय इतिहास में इसलिए भी विशेष महत्व रखता है कि-ये हिंदुओं(उच्च वर्ण /सवर्ण) के बीच हुवा था अब प्रश्न उठेगा हिंदुओं के बीच ये कैसी संधि थी?दरअसल भारतीय शास्त्रों,महाकाव्यों,वेदों,स्मृतियों (खासकर मनुस्मृति ) में हिंदुओं के अंदर एक वर्ग को अछूत बनाया गया.जिसको हिन्दू होकर भी उस संस्कृति के अंतर्गत समाज में कभी भी इज्जत नहीं मिली वो वर्ग हमेशा उपेक्षा और शोषण,घृणा का ही पात्र रहा.

जरा पीछे मुड़कर रामायण की ओर देखें तो शम्बूक ऋषि का वध याद आता है.एकलब्य का कथानक से सभी परिचित हैं.ये कहा जाए कि हिन्दुत्व हमेसा so-called अछूतों/दलितों के आगे बढ़ने के मार्ग में अवरोध खड़ा करता रहा है.और बीसवीं सदी में भी ये काम गांधीजी ने भी कर दिखाया पूना समझौता के लिए डॉ0 अम्बेडकर को विवश करके.

डॉ0 अंबेडकर जिन्ना नहीं थे

मैंने जिया लाल आर्य की लिखी पुस्तक”दलित समाज आज की चुनौतियाँ”पढ़ी उन्होंनेे पूना पैक्ट केे विषय मेें जो समीक्ष की है उंससे कुछ पंक्तियां ली हैैं जो नििम्नवट हैैं–

पूना समझौता ने न केवल दलितों का बल्कि भारतीय समाज का उपकार किया है .इसके लिए कमोवेश मैं गांधी और अंबेडकर दोनों को उत्तरदाई मानता हूं, जिस समय यह ऐतिहासिक समझौता हुआ उस समय स्वाधीनता आंदोलन भी चल रहा था .ब्रिटिश सरकार ने अंबेडकर के उस प्रस्ताव को मान लिया था कि दलितों का अलग चुनाव क्षेत्र होना चाहिए और दलितों या हरिजनों के प्रतिनिधियों का चुनाव हरिजनों द्वारा होना चाहिए .गांधी ने इसके विरोध में भूख हड़ताल की और अंबेडकर पर “राष्ट्रीय आंदोलन का दबाव बहुत भारी पड़ा .अंबेडकर जिन्ना नहीं थे उन्हें नम्र होना पड़ा.”

क्या पूना पैक्ट की समीक्षा होनी चाहिये?

जो भी घटनाक्रम ऊपर बताए गए है,गांधीजी द्वारा जितनी ताकत कम्युनल अवार्ड को खत्म करने के लिए लगाई उसका आधा हिस्सा भी उनके द्वारा दिये गए हरिजनों के सामाजिक उत्थान के लिया किया होता तो उनकी अमरता और अमर हो जाती. मगर पूना पैक्ट की सच्चाई यही है कि -अंग्रेजों द्वारा अछूतों को प्रदान किया गया अधिकार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने छीन लिया.पूना पैक्ट के बाद डॉ0 अंबेडकर ने कहा था-“आज गांधी ने मेरी राजनीतिक हत्या कर दी है”

पूना पैक्ट की सच्चाई और गांधी का दलित प्रेम.
गांधी और अंबेडकर

जिस बात का अंदेशा डॉ0 अंबेडकर को था कि-पूना पैक्ट के बाद दलित राजनीति में चमचा युग की शुरुआत हो जाएगी.पूना पैक्ट की सच्चाई को समझें तो यह कथन फिट बैठता है.दलित वर्ग के बुद्धिजीवी वर्ग राजनीति में आरक्षण को समाप्त करने की आवाज उठाने लगे हैं,क्योंकि पूना पैक्ट से बने दलित सांसद और विधायक दलितों के प्रसंग पर गूंगे बन जाते हैं.

सन्दर्भ:1-चमचा युग ( मा0 कांशीराम)

2-दलित समाज आज की चुनौतियाँ(जियालाल आर्य)

Disclaimer–लेख में जो भी शब्द प्रयोग हुए हैं वो तत्तकालीन परिस्थितियों पर आधारित हैं.लेखक का मन्तव्य किसी को ठेस पहुंचाना नहीं है.

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I am I.P.Human My education is m.sc.physics and PGDJMC I am from Uttarakhand. I am a small blogger

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