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    क्रांति पर सरदार भगत सिंह (Sardar bhagat Singh) के विचार

    आज आपको भगत सिंह (Sardar bhagat Singh) के उन अनमोल विचारों से अवगत करा रहा हूँ,जिसको पढ़कर उनके अदम्य साहस,बुद्धिमत्ता और ज्ञान की परख करना आसान हो जाएगा।क्रांति शब्द भारत की आजादी के लिए एक विस्फोटक बम से कम नहीं था।लेकिन सरदार भगत सिंह ने क्रांति की परिभाषा (kraanti kee paribhaasha) को जिस तरह तर्कसंगत बयां किया है ,वह अनमोल है।

    क्रान्ति के सम्बन्ध में भगत सिंह के विचार बहुत स्पष्ट थे। निचली अदालत में जब उनसे पूछा गया कि क्रान्ति शब्द से उनका क्या मतलब है, तो उत्तर में उन्होंने कहा था-

    क्रान्ति के लिए खूनी संघर्ष अनिवार्य नहीं है, और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा का कोई स्थान है।वह बम और पिस्तौल की संस्कृति नहीं है। क्रान्ति से हमारा अभिप्राय यह है कि वर्तमान व्यवस्था, जो खुले तौर पर अन्याय पर टिकी हुई है, बदलनी चाहिए।

    भगत सिंह

    सरदार भगत सिंह की नजरों में क्रांति की परिभाषा:(kraanti kee paribhaasha)

    अपनी बात।को और भी स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा था, “क्रान्ति से हमारा अभिप्राय अन्ततः एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना से है जिसको इस प्रकार के घातक खतरों का सामना न करना पड़े और जिसमें सर्वहारा वर्ग की प्रभुसत्ता को मान्यता हो तथा एक विश्वसंघ
    मानव जाति को पूँजीवाद के बन्धन से और साम्राज्यवादी युद्धों से उत्पन्न होनेवाली बरबादी और मुसीबतों से बचा सके “।


    समाजवाद की दिशा में भगत सिंह (Sardar bhagat Singh) की वैचारिक प्रगति की रफ्तार बहुत तेज थी। उन्होंने 1924 से 1928 के बीच विभिन्न विषयों का विस्तृत अध्ययन किया था। लाला लाजपत राय की द्वारका दास लाइब्रेरी के पुस्तकाध्यक्ष राजाराम शास्त्री के अनुसार उन दिनों भगत सिंह (Sardar bhagat Singh) वस्तुतः “किताबों को निगला करता था।” उनके प्रिय विषय थे रूसी क्रान्ति, सोवियत संघ, आयरलैंड, फ्रांस और भारत का क्रान्तिकारी आन्दोलन, अराजकतावाद और मार्क्सवाद।

    उन्होंने और उनके साथियों ने 1928 के अन्त तक समाजवाद को अपने आन्दोलन का अन्तिम लक्ष्य घोषित कर दिया था और अपनी पार्टी का नाम भी तदनुसार बदल दिया था। उनकी यह वैचारिक प्रगति उनके फाँसी पर चढ़ने के दिन तक जारी रही।

    ईश्वर और धर्म के बारे में सरदार भगतसिंह (Sardar bhagat Singh) के विचार।


    ईश्वर, धर्म तथा रहस्यवाद पर भगत (Sardar bhagat Singh) के विचारों के बारे में कुछ शब्द कहे बगैर यह भूमिका अधूरी रह जाएगी। यह इसलिए भी जरूरी है कि आज हर तरह के प्रतिक्रियावादी,
    रूढ़िवादी और साम्प्रदायिकतावादी लोग भगत सिंह तथा चन्द्रशेखर आज़ाद के नाम और यश को अपनी निज की राजनीति और विचारधारा के पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं।
    अपने आपको नास्तिक बताते हुए “भगत सिंह (Sardar bhagat Singh) ने शुरू के क्रान्तिकारियों के तरीके और दृष्टिकोण के लिए पूरा सम्मान प्रदर्शित किया है और उनकी धार्मिकता के स्रोतों की पड़ताल की है।

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    वे संकेत करते हैं कि अपने स्वयं के राजनीतिक कार्यों की वैज्ञानिक समझ के
    अभाव में उन क्रान्तिकारियों को अपनी आध्यात्मिकता की रक्षा करने, वैयक्तिक प्रलोभनों के विरुद्ध संघर्ष करने, अवसाद से उबरने, भौतिक सुखों और अपने परिवारों तथा जीवन तक को त्यागने की सामर्थ्य जुटाने के लिए विवेकहीन विश्वासों एवं रहस्यवादिता की
    आवश्यकता थी। एक व्यक्ति जब निरन्तर अपने जीवन को जोखिम में डालने और दूसरे सारे बलिदान करने के लिए तत्पर होता है तो उसे प्रेरणा के गहरे स्रोत की आवश्यकता होती है।

    शुरू के क्रान्तिकारी, आतंकवादियों की यह अनिवार्य आवश्यकता रहस्यवाद और धर्म से पूरी होती थी। लेकिन उन लोगों को ऐसे स्रोतों से प्रेरणा लेने की जरूरत नहीं रह
    गई थी जो अपने कामों की प्रकृति को समझते थे, जो क्रान्तिकारी विचारधारा की दिशा में आगे बढ़ चुके थे, जो कृत्रिम आध्यात्मिकता की बैसाखी लगाए बिना अन्याय के विरुद्ध संघर्ष कर सकते थे, जो स्वर्ग और मोक्ष के प्रलोभन और आश्वासन के बिना ही विश्वास के
    साथ और निर्भीक भाव से फाँसी के तख्ते पर चढ़ सकते थे, जो दलितों की मुक्ति और स्वतन्त्रता के पक्ष में इसलिए लड़े क्योंकि लड़ने के अलावा और कोई रास्ता ही न था।”

    लाहौर हाईकोर्ट में शहीद भगत सिंह का बयान।


    असेम्बली बम कांड के केस की अपील के दौरान लाहौर हाई कोर्ट में बयान देते हुए भगत सिंह ने विचारों की महत्ता पर बल देते हुए कहा था : “इन्कलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज की जाती है,” और उसके आधार पर उन्होंने यह सूत्र प्रस्तुत किया कि-


    “आलोचना और स्वतन्त्र विचार किसी क्रान्तिकारी के दो अपरिहार्य गुण हैं,” और यह कि “जो आदमी प्रगति के लिए संघर्ष करता है उसे पुराने विश्वासों की एक-एक बात की आलोचना करनी होगी, उस पर अविश्वास करना होगा और उसे चुनौती देनी होगी।

    इस प्रचलित विश्वास के एक-एक कोने में झाँककर उसे विवेकपूर्वक समझना होगा।”

    उन्होंने दृढ़ता के साथ कहा था कि “निरा विश्वास और अन्धविश्वास खतरनाक है, इससे मस्तिष्क कुंठित होता है और आदमी प्रतिक्रियावादी हो जाता है।”

    भगत सिंह स्वीकार करते थे कि “ईश्वर में कमजोर आदमी को जबरदस्त आश्वासन और सहारा मिलता है और विश्वास उसकी कठिनाइयों को आसान ही नहीं बल्कि सुखकर भी बना देता है।”

    वे यह भी जानते थे कि “आँधी और तूफान में अपने पाँवों पर खड़े रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है।” लेकिन वे सहारे के लिए किसी भी बनावटी अंग के विचार को दृढ़तापूर्वक अस्वीकार करते थे। वे कहते थे-

    “अपनी नियति का सामना करने के लिए मुझे किसी नशे की जरूरत नहीं है।” उन्होंने ऐलान किया था कि “जो आदमी अपने पाँवों पर खड़े होने की कोशिश करता है और यथार्थवादी हो जाता है, उसे धार्मिक विश्वास को एक तरफ रखकर, जिन-जिन मुसीबतों और दुखों में परिस्थितियों ने उसे डाल दिया है, उनका एक मर्द की तरह बहादुरी के साथ सामना करना होगा।”


    ईश्वर, धार्मिक विश्वास और धर्म को यह तिलांजलि भगत सिंह के लिए न तो आकस्मिक थी और न ही उनके अभिमान या अहम का परिणाम थी। उन्होंने बहुत पहले 1926 में ही ईश्वर की सत्ता को अस्वीकार कर दिया था। उन्हीं के शब्दों में, “1926 के अन्त तक मुझे
    इस बात पर यकीन हो गया था कि सृष्टि का निर्माण, व्यवस्थापन और नियन्त्रण करनेवाली किसी सर्वशक्तिमान परम सत्ता के अस्तित्व का सिद्धान्त एकदम निराधार है।”

    भावना कभी नहीं मरती:


    वह जुलाई, 1930 का अन्तिम रविवार था। भगत सिंह(Sardar bhagat Singh)लाहौर सेन्ट्रल जेल से हमें मिलने
    के लिए बोर्टल जेल आए थे। वे इस तर्क पर सरकार से यह सुविधा हासिल करने में कामयाब हो गए थे कि उन्हें दूसरे अभियुक्तों के साथ बचाव के तरीकों पर बातचीत करनी है। तो उस दिन हम किसी राजनीतिक विषय पर बहस कर रहे थे कि बातों का रुख फैसले
    की तरफ मुड़ गया, जिसका हम सबको बेसब्री से इन्तजार था।

    मजाक-मजाक में हम एक-दूसरे के खिलाफ फैसले सुनाने लगे, सिर्फ राजगुरु और भगत सिंह को इन फैसलों से बरी रखा गया। हम जानते थे कि उन्हें फाँसी पर लटकाया जाएगा। “और राजगुरु और मेरा फैसला? क्या आप लोग हमें बरी कर रहे हैं?” मुस्कराते हुए भगत सिंह ने पूछा। किसी ने कोई जवाब नहीं दिया।

    “असलियत को स्वीकार करते डर लगता है?” धीमे स्वर में उन्होंने पूछा। चुप्पी छाई रही। हमारी चुप्पी पर उन्होंने ठहाका लगाया और बोले, “हमें गर्दन से फाँसी के फन्दे से तब तक लटकाया जाए जब तक कि हम मर न जाएँ। यह है असलियत । मैं इसे जानता
    हूँ। तुम भी जानते हो। फिर इसकी तरफ से आँखें क्यों बन्द करते हो?”
    अब तक भगत सिंह अपने रंग में आ चुके थे। वे बहुत धीमे स्वर में बोल रहे थे। यही उनका तरीका था। सुननेवालों को लगता था कि वे उन्हें फुसलाने की कोशिश कर रहे हैं।

    चिल्लाकर बोलना उनकी आदत नहीं थी। यही शायद उनकी शक्ति भी थी। वे अपने स्वाभाविक अन्दाज में बोलते रहे, “देशभक्ति के लिए यह सर्वोच्च पुरस्कार
    है, और मुझे गर्व है कि मैं यह पुरस्कार पाने जा रहा हूँ। वे सोचते हैं कि मेरे पार्थिव शरीर
    को नष्ट करके वे इस देश में सुरक्षित रह जाएंगे। यह उनकी मूल है। वे मुझे मार सकते
    हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं मार सकते। वे मेरे शरीर को कुचल सकते हैं, लेकिन मेरी
    भावनाओं को नहीं कुचल सकेंगे। ब्रिटिश हुकूमत के सिर पर मेरे विचार उस समय तक
    एक अभिशाप की तरह मँडराते रहेंगे जब तक वे यहाँ से भागने के लिए मजबूर न हो जाएँ।”

    भगत सिंह पूरे आवेश में बोल रहे थे। कुछ समय के लिए हम लोग भूल गए कि जो आदमी हमारे सामने बैठा है वह हमारा सहयोगी है। वे बोलते जा रहे थे : “लेकिन यह तसवीर का सिर्फ एक पहलू है। दूसरा पहलू भी उतना ही उज्ज्वल है। ब्रिटिश हुकूमत के लिए मरा हुआ भगत सिंह (Sardar bhagat Singh) जीवित भगत सिंह से ज्यादा खतरनाक होगा।

    मुझे फाँसी हो जाने के बाद मेरे क्रान्तिकारी विचारों की सुगन्ध हमारे इस मनोहर देश के वातावरण में व्याप्त हो जाएगी।
    वह नौजवानों को मदहोश करेगी और वे आजादी और क्रान्ति के लिए पागल हो उठेगे। नौजवानों
    का यह पागलपन ही ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को विनाश के कगार पर पहुँचा देगा। यह मेरा
    विश्वास है। मैं बेसब्री के साथ उस दिन का इन्तजार कर रहा हूँ जब मुझे देश के लिए
    मेरी सेवाओं और जनता के लिए मेरे प्रेम का सर्वोच्च पुरस्कार मिलेगा।”

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